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Savitribai Phule – सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले

Savitribai-Phuleसावित्रीबाई ज्योतिराव फुले (3 जनवरी 1831 – 10 मार्च 1897) भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सुधारिका एवं मराठी कवियत्री थीं। उन्होंने अपने पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले के साथ मिलकर स्त्री अधिकारों एवं शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। वे प्रथम महिला शिक्षिका थीं। उन्हें आधुनिक मराठी काव्य का अग्रदूत माना जाता है। 1852 में उन्होंने बालिकाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की।

परिचय
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। इनके पिता का नाम खन्दोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1840 में ज्योतिबा फुले से हुआ था।

सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थीं। महात्मा ज्योतिबा को महाराष्ट्र और भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन में एक सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में माना जाता है। उनको महिलाओं और दलित जातियों को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए जाना जाता है। ज्योतिराव, जो बाद में ज्योतिबा के नाम से जाने गए सावित्रीबाई के संरक्षक, गुरु और समर्थक थे। सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना। वे एक कवियत्री भी थीं उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता था।

सामाजिक मुश्किलें
वे स्कूल जाती थीं, तो विरोधी लोग पत्थर मारते थे। उन पर गंदगी फेंक देते थे। आज से 189 साल पहले बालिकाओं के लिये जब स्कूल खोलना पाप का काम माना जाता था कितनी सामाजिक मुश्किलों से खोला गया होगा।

सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं। हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया। जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फैंका करते थे। सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं। अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से देती हैं।

विद्यालय की स्थापना
3 जनवरी 1848 में पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ उन्होंने महिलोओ के लिए एक विद्यालय की स्थापना की। एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए। तत्कालीन सरकार ने इन्हे सम्मानित भी किया। एक महिला प्रिंसिपल के लिये सन् 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती। लड़कियों की शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी। सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया, वह भी पुणे जैसे शहर में।आज औरतों को उन्हें आदर्श मानना चाहिए

निधन
10 मार्च 1897 को प्लेग के कारण सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया। प्लेग महामारी में सावित्रीबाई प्लेग के मरीज़ों की सेवा करती थीं। एक प्लेग के छूत से प्रभावित बच्चे की सेवा करने के कारण इनको भी छूत लग गया। और इसी कारण से उनकी मृत्यु हुई।

गूगल डूडल
3 जनवरी 2017 को उनके 186 वे जन्मदिवस पर गूगलने उनका गूगल डूडल प्रसिद्ध कर उन्हें अभिवादन किया है

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धानुक समाज की तरक्की, सामाजिक सुरक्षा के उपाय…

धानुक समाज की तरक्की, सामाजिक सुरक्षा के उपाय…

धानुक समाजधानुक समाज आर्थिक रूप से अन्य कई समाजों के मुकाबले बेहतर है अर्थात धनवान है, ज्ञानी है, दानी है, बुद्धिमान है, चारित्रसम्पन्न है, सुस्वभावी है, शिक्षित है, मिलनसार है, ईमानदार है, मेहनती भी है फिर भी समाज दिन-ब-दिन पिछड़ता जा रहा है अपनी पहचान को, अपने गौरव को खोता जा रहा है क्यों? क्योंकि एकता का आभाव है। समाज में एकता की कमी है। एकता से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है। एकता ही समाजोत्थान का आधार है। जो समाज संगठित होगा, एकता के सूत्र में बंधा होगा उसकी प्रगति को कोई रोक नहीं सकता किन्तु जहाँ एकता नहीं है वह समाज ना प्रगति कर सकता है, ना समृद्धि पा सकता है और ना अपने सम्मान को, अपने गौरव को कायम रख सकता है। धानुक समाज इसका जीता-जागता उदहारण है। हम सभी भाई एकसाथ रहते तो है लेकिन क्या हम उन्नत्ति-प्रगति के लिए एक-दूजे का साथ देते है?  नहीं; तो सिर्फ एकसाथ रहने का कोई मतलब नहीं। एकसाथ इस शब्द को कोई अर्थ तभी है जब हम एकसाथ रहे भी और एक-दुसरे का साथ दे भी। ऐसी एकता को ही सही मायने में ‘एकता’ कहा जाता है।

समाज में एकता को कायम रखने के लिए समाजशास्त्रियों ने ‘संगठन’  नामक एक व्यवस्था सूचित की और हर एक समाज ने इस व्यवस्था के महत्त्व को समझते हुए इसे अपनाया। धानुक समाज में भी कई संगठन बने हुए है। समाज के संगठन का पहला काम होता है की समाज के सभी लोगों में अपने जाती के प्रति एक अस्मिता को, स्व-अस्मिता को, गर्व की अनुभूति को जागृत रखें। अपनी संस्कृति को समाज के लोगों की जीवनशैली का एक अंग बनाकर अपनी संस्कृति का संरक्षण-संवर्धन करें। समाज की एकता के लिए यही सबसे पहली जरुरत है, और पहली शर्त भी यही है। अस्मिता और संस्कृति का यही मजबूत धागा समाज को एकता के सूत्र में बांधे रखता है। क्या आज धानुको में अपने “धानुक” होने के प्रति वह अस्मिता, वह गर्व की अनुभूति जागृत है? धानुक संस्कृति के आन-बाण-शान के लिए, संरक्षण-संवर्धन के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगाने का जज्बा बचा है? क्या समाज के युवाओं को अपने “धानुक” होने पर नाज होता है? गर्व अनुभव होता है? यदि नहीं तो यह बात पत्थर की लकीर है की समाज में, समाज के नाम पर एकता बन ही नहीं सकती। बिना इस स्व-अस्मिता के समाज का संगठन बन ही नहीं सकता और जैसे तैसे बन भी जाये या बना भी ले तो ना उस संगठन का समाज पर कोई प्रभाव रहता है और ना ही समाज के लोगों को संगठन से कोई लगाव रहता है । संगठन मात्र एक औपचारिकता भर बन के रह जाता है। ऐसी स्थिति में कोई नेतृत्व, कोई संगठन समाज में एकता कायम नहीं कर सकता। एकता के लिए “स्व-अस्मिता” यही बुनियादी जरुरत है। जैसे विवाह के लिए बुनियादी जरुरत होती है – एक विवाहयोग्य लड़के की और लड़की की। बाकि सब जरूरतें….रिश्तेदार, यार-दोस्त, बाराती, पंडितजी, विवाह के अन्य इंतजाम आदि सब बाद की बात है।

आज समाज के सभी लोगों में खासकर युवाओं से ‘धानुक संस्कृति’ के बारे में उनकी जानकारी जानना चाहे तो वो कुछ बता नहीं पाते है। कई लोगों से व्यक्तिगत बातचीत में जब हमने कहा की, चलो…धानुक संस्कृति के बारे में कोई ऐसी बात बताएं जिसे की समाज के सभी लोग कहे की हां, इस बात पर हम सभी एकमत है। लेकिन कोई सफलता हाथ नहीं लगती क्योंकि ऐसी कोई बात नहीं जिसमे हम सभी एकमत हो, ऐसा नहीं है की धानुको की कोई संस्कृति ही नहीं रही है या जीवनशैली में, दिनचर्या में उनका समावेश ही नहीं रहा है। समाज को दिशा देने का, मार्गदर्शन करने का कार्य एक व्यवस्था के रूप में समाज-गुरुओं को सौपा जाना चाहिए था। ताकि वे एक सुव्यवस्थित प्रणाली, एक व्यवस्था का निर्माण कर उसे सुचारू रूप से चला सके। आज हम में से ज्यादातर लोगों को समाज के इतिहास बारे में कुछ भी पता ही नहीं है।

दुख के साथ कहना पड रहा है की समाज के संगठन इस “धानुक अस्मिता” को समाज के लोगों में जागृत रख पाने में नाकामयाब रहे है। धानुक संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन करने के अपने दायित्व को निभाने में समाज के संगठन असफल रहे है। यह एक कटु सत्य है और इसको स्वीकारना पड़ेगा। समाज के संगठन की इस नाकामयाबी का, लापरवाही का खामियाजा आज भी समाज को भुगतना पड़ रहा है। मित्रों, एकता के लिए आवश्यक यह कार्य कोई महीने दो महीने का अभियान नहीं होता है बल्कि ऐसे एक व्यवस्था के रूप में कार्य करता है जो एक प्रक्रिया की तरह निरंतर चलता रहता है। समाज के गौरव को पुनर्स्थापित करने के लिए, समाज के लोगों की आर्थिक प्रगति हो जिससे की समाज समृद्ध हो इसलिए समाज में एकता होना जरुरी है और समाज में एकता के लिए ऐसी एक स्थाई व्यवस्था का पुनर्निर्माण जरुरी हो गया है।

समाज के संगठन का दूसरा मुख्य काम होता है की समाज के लोगो की आर्थिक प्रगति के लिए संगठन सहयोगी के रूप में कार्य करें। इस कार्य हेतु उचित मार्गदर्शन समय-समय पर करता तो रहे ही बल्कि जहाँ आवश्यक हो वहां हर तरह से सहयोग भी करें। केवल इतना ही नहीं बल्कि समाज के आर्थिक हितों की रक्षा करने का, समाज के लोगों को एवं माता-बहनों को सामाजिक सुरक्षा देने का कार्य भी समाज के संगठन को करना होता है। ऐसा होता है तभी समाज के लोगों को संगठन की जरुरत और महत्त्व है का पता चलता है और तभी वे संगठन से जुड़ते है। तब ही समाज के लोग या समाज, संगठन का कहा मानते है। संगठन के नेतृत्व को, पदाधिकारियों को सही मायने में सम्मान मिलता है, समाज पर उनका अधिकार चलता है। समाज उनका अधिकार स्वीकार करता है। आज देशभर में, शहर, तहसील, जिला स्तर से लेकर राष्ट्रिय स्तर तक संगठन और पदाधिकारी बने हुए है। क्या संगठन और उनके पदाधिकारियों द्वारा यह सब कार्य होते है? यदि नहीं; तो क्यों समाज के लोग संगठन से जुड़ेंगे? क्योंकर पदाधिकारियों की सुनी जाएगी? इसमें पूरा दोष पदाधिकारियों का भी नहीं है। वे तो समाजकार्य करने के नेक जज्बे के साथ संगठन से जुड़ते है, जिम्मेदारियों को उठाने के लिए पदाधिकारी बनते है लेकिन संगठन ने ऐसी कोई व्यवस्था का निर्माण ही नहीं किया है की वह समाज के लिए कोई परिणामकारक कार्य कर सकें। शहर से लेकर प्रदेश स्तर पर संगठन और पदाधिकारी बना दिए गए लेकिन उन्हें कार्य करने के लिए जो एक समुचित व्यवस्था और संसाधनो की आवश्यकता होती है वह तो है ही नहीं, ऐसी व्यवस्था बनाई ही नहीं गई। बिना किसी संसाधनो के पदाधिकारी परिणामकारक कार्य करे भी तो कैसे करे? फिर वह भी क्या करे? जो, जितना कर सकते है करते है और जैसे तैसे अपना कार्यकाल पूरा कर लेते है। संसाधनो और व्यवस्था के आभाव में वह नाममात्र के पदाधिकारी बनकर रह गए है। इसलिए अब यह जरुरी है की एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जाये जिसमें पदाधिकारी और संगठन समाज के लोगो के काम आ सके। समाज के लोगो के विकास में, उन्नत्ति में अपना योगदान दे सकें।

उपरोक्त बातों के अतिरिक्त और भी कई महत्वपूर्ण बातें है जिसे करने की आवश्यकता है। देशभर में समाज के लिए कार्य करनेवाले अनेक संगठन बने हुए है, इन सभी संगठनों को आपस में सामंजस्य बनाने के लिए एक मंच पर आना अतिआवश्यक है जिससे, सभी में एक बेहतर समन्वय, संपर्क और सुसंवाद बनाकर समाजहित के कार्य व्यापक एवं परिणामकारक बनाये जा सकें। जो सभी संगठनों में व्याप्त अबतक की संगठनात्मक कमियों को दूर करते हुए समाज के लोगो की आर्थिक विकास दर को तेज किया जा सकें, उनके आर्थिक हितों की रक्षा की जा सकें, उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जा सकें और धानुक संस्कृति का संरक्षण-संवर्धन करते हुए समाज के गौरव को पुनर्स्थापित किया जा सकें। आशा है धानुक समाज के गौरव को पुनर्स्थापित करने के लिए सभी धानुक संगठन बिना किसी भेदभाव के समाज की उन्नति और समृधि के लिए कृतसंकल्प है, संकल्पबद्ध है।

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Women need to be financially independent

हमारे समाज की महिलाओ को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने की आवश्यकता है

वित्तीय स्वतंत्रता एक जीविका को सकल करने की क्षमता है जो आपको बिना किसी प्रतिबंध के अपने खर्चों को बनाए रखने की अनुमति देती है। पुरुष हो या महिला, अपनी जरूरतों को अपनी शर्तों पर पूरा करना बहुत जरूरी है। हालांकि, भारतीय महिलाओं ने वित्तीय स्वतंत्रता से अधिक घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता दी, जो संघर्ष के समय उन्हें पीड़ाओं और विध्वंस के गहरे निशान के साथ छोड़ देती है। भारत में कई अभियान हैं जो केवल महिलाओं के लिए उन्हें मार्गदर्शन देने के लिए निर्धारित किए गए हैं ताकि उन्हें आर्थिक रूप से उदार होने के तथ्य को समझा जा सके। अभियान केवल आपके पथ का लालटेन हो सकता है, लेकिन वास्तविक कार्य आपके पैरों को करना है जो इसका मार्ग खुद बखुद खोज लेगा।

एक महिला के लिए वित्तीय स्वतंत्रता न केवल शिष्टता और आत्म-आश्वासन का स्रोत है, बल्कि यह उसके और उसके परिवार के लिए निर्णय लेने के महत्वपूर्ण मामलों में योगदान करने के लिए उसकी विश्वसनीयता को अनुदान देती है।

मान लीजिए कि एक महिला या लड़की आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं है, तो वास्तव में उसे क्या करना चाहिए यहाँ हम उसके ऊपर चर्चा करेंगे:

  • सबसे बुनियादी बात तब होती है जब वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं होती है; उसे एक कठपुतली के रूप में ढाला गया है जिसके तार उसके हाथों में हैं जो उसके वित्तीय मुद्दों को हल कर रहा है।
  • ऐसी महिलाएं जो ऐसे समाज से आती हैं गाली गलौज आम बात है वहां पर वे प्रायः शारीरिक यातनाओं से गुजरते है। अगर उन्होंने कमाया होता तो ऐसा कभी नहीं होता।
  • उसे हर स्थिति में हर बार समायोजित करना पड़ता है क्योंकि वह कमाई नहीं कर रही है। वह अपने नियम और शर्तों पर अपना जीवन नहीं जी सकती।

उपर्युक्त बिंदु इस समाज को यह समझने के लिए काफी संतोषजनक हैं कि हमारी महिलाओं को “सिर्फ एक गृहिणी” से “एक आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिला” के रूप में उनका पोषण और नवीकरण करना कितना आवश्यक है।

हमारा समाज हमेशा सोचता है कि एक महिला को सिर्फ घर में बैठकर खाना बनाना है और अपने परिवार और एक आदमी के लिए खाना बनाना और कमाने का एकमात्र अधिकार है। हां, हमने अपने समाज की ऐसी मानसिकता की रूढ़िवादिता को कुछ हद तक अवश्य तोड़ा है, लेकिन फिर भी हम अभी भी कई रूढ़िवादी लोगों से आच्छादित हैं।

इस रूढ़िवादी मानसिकता को मिटाने के लिए एक कदम शुरू किया गया है और हम यहां एक कदम आगे बढ़ने के लिए हैं और आप सभी जानते हैं कि वास्तव में महिलाओं के लिए आर्थिक रूप से उदार होना क्यों आवश्यक है?

आज की समकालीन दुनिया में महिलाएं अधिक आत्मविश्वास से भरी हुई हैं। वे पारिवारिक कृषि कर्तव्यों का समर्थन कर रहे हैं और पुरुषों के बराबर हैं। वे उत्पादक रूप से कमा रहे हैं और एक दिन पूरी तरह से स्वतंत्र महिला बनने के लिए दृढ़ हैं।

कुछ बिंदुओं से आप सभी को यह पता चल जायेगा की क्यों हमें आर्थिक रूप से उदार होने की आवश्यकता है।

नौकरी हो जय जीवन,  इस दुनिया में कुछ भी निश्चित नहीं है। एक परिवार में आम तौर पर एक ही रोटी कमाने वाले यानि पति या पिता का कर्ज़ होता है, लेकिन अगर इनमें से किसी के पास कभी भी पैसा न हो, तो नौकरी नहीं? हम आम तौर पर ऐसे विषयों पर चर्चा नहीं करते हैं क्योंकि हम उन्हें अतार्किक या अनिश्चित पाते हैं, लेकिन हां, हम ऐसी स्थितियों का सामना भी कर सकते हैं। एक पति अगर किसी खतरनाक स्थिति में हो तो कुछ पारिवारिक समस्याएं हो सकती हैं कि एक महिला ऐसे में कैसे जीवित रहने वाली है? ये प्रश्न आपके जीवन स्तर के विपरीत अप्रासंगिक हो सकते हैं, लेकिन फिर भी, यह समाज ऐसी महिलाओं से भरा हुआ है, जिन्हें घरेलू हिंसा की स्थितियों और आघात का सामना करना पड़ता है। जीवन में आपात स्थिति की ऐसी स्थितियाँ एक सबक देती हैं कि हममें से हर कोई लैंगिक रूप से स्थिर और स्वतंत्र होना चाहिए ताकि जीवन के बुरे समय में कम से कम वे अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकें। कभी-कभी हम मुद्रास्फीति की स्थितियों का सामना करते हैं जो प्रत्येक परिवार और प्रत्येक कार्यालय में चर्चा का सबसे आम एजेंडा है, अगर हमारे पास परिवार में एक अतिरिक्त सदस्य की कमाई होगी तो यह देश की जीडीपी को नुकसान या कम नहीं करेगा।

आमतौर पर हमेशा इस रूप में क्यों माना जाता है कि एक महिला परिवारों को चलाने में असमर्थ है अगर वे बाहर जाते हैं और कमाते हैं? खैर, सरोजिनी नायडू, ममता बनर्जी, डॉ। टेसी थॉमस, भारत की मिसाइल महिला आदि कुछ ऐसी देवियाँ हैं, जिन्होंने उन सभी के लिए एक मिसाल कायम की है, जो कहती हैं कि महिलाएँ मल्टी-टास्किंग नहीं हो सकतीं। जब एक महिला एक परिवार में कमाती है तो घर अधिक सकारात्मक और सक्रिय हो जाता है। वह अधिक आत्मविश्वास और तरोताजा महसूस करने लगी क्योंकि उसे अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए पैसे के लिए अपने पति या पिता से मांगनी नहीं पड़ती। इन सभी पहलुओं के अलावा, एक कमाऊ महिला भी आजीविका के दैनिक खर्चों में योगदान करेगी। घर में आपात स्थिति के समय जब घर का एक रोटी कमाने वाला घर के खर्च में योगदान नहीं दे पाता है तो अन्य अपने जीवन के सुचारू प्रवाह को जारी रखने में मदद कर सकते हैं।

भारत में 70% महिलाएँ घरेलू हिंसा से पीड़ित हैं; अगर समाज उन्हें काम करने की अनुमति देगा और यह निश्चित रूप से कम से कम 20% तक गिर जाएगा।

इसका अंत सिर्फ इतना नहीं है कि एक कमाऊ महिला एक सामान्य महिला की तुलना में एक अलग स्तर का विश्वास रखती है। कहा जाता है कि अगर आप आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं तो आपका मनोबल अपने आप बढ़ जाता है!

जब वह कमाती है तो वह सुरक्षित और मजबूत महसूस करने लगती है, उसने अपने लक्ष्य और जीवन स्तर को निर्धारित किया है। कभी-कभी वह दूसरों को आत्मविश्वासी होने के लिए प्रेरित करती है और उन्हें अपने लिए बढ़ने और कमाने के लिए प्रेरित करती है। साथ ही, एक देश को एक महिला की कमाई से लाभ होता है क्योंकि एक अतिरिक्त भाग देश की जीडीपी में जोड़ा जाता है। कर और राजस्व का भुगतान उसके द्वारा किया जाता है जो अन्यथा देश को लाभान्वित करने वाला है।

हम हर महिला को काम करने दे सकते हैं, बस हमें एक महिला और उसके मनोबल के प्रति अपनी मानसिकता को बदलना होगा।

यदि आप उपरोक्त बिंदुओं से गुजरते हैं, तो आप देखते हैं, यह सभी महिलाओं के लिए आवश्यक है; आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के लिए विवाहित, एकल, अलग, विधवा या तलाकशुदा। एक महिला एक बिजनेस टाइकून और एक गृहिणी दोनों हो सकती है; वह दोनों कार्यों का प्रबंधन करने के लिए पर्याप्त सक्रिय है।

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आज भी ये बच्चें इतनी मेहनत सिर्फ और सिर्फ शिक्षा पाने के लिए कर रहे है।क्या ये महानगरों के निजी विद्यालयों के स्मार्ट क्लासेज में पढ़ने वाले बच्चों से कर पाएंगे? सोचियेगा जरूर? #धानुक #धानुकसमाज #धानुकजाति #Dhanuk #dhanukसमाज ...
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#धानुकजाति में एकता #धानुकसमाज #धानुक #Dhanuk #dhanuksamaj #धानुक_जाति ...
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लेख - १० दिनांक: १७ सितम्बर २०२६शीर्षक: "सामाजिक एकता हमारी सबसे बड़ी सामूहिक शक्ति" मैं ऐसे लेख की श्रृंखला लेकर आ रहा हूँ जो 'धानुक समाज के नाम आत्ममंथन' के नाम से होगी। पढ़ने के लिए मुझे फॉलो करें। #शशिधरकुमार #धानुकजाति #धानुकसमाज #धानुक #Dhanuk #dhanuksamaj #धानुक_जाति ...
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Sharp Edge: We now live in an India where talk of justice is momentary and transient. Arrests are no more than photo opportunities. The guilty have no fear
Politically connected goondas can openly brag about assaulting people secure in the knowledge that they will soon get bail

लेख - १०
दिनांक: १७ सितम्बर २०२६
शीर्षक: "सामाजिक एकता हमारी सबसे बड़ी सामूहिक शक्ति"
मैं ऐसे लेख की श्रृंखला लेकर आ रहा हूँ जो 'धानुक समाज के नाम आत्ममंथन' के नाम से होगी। पढ़ने के लिए मुझे फॉलो करें। #शशिधरकुमार #धानुकजाति #धानुकसमाज #धानुक #Dhanuk #dhanuksamaj #धानुक_जाति

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Ashneer Grover:
🗣️ “If I transfer ₹1 lakh to my friend through UPI, or pay ₹3,000 using a QR code, the cost of running the system is the same.

> So, if I transfer ₹1 lakh to my friend, nobody makes money from it.

But if I pay ₹2,500 to a small shopkeeper, the government

अश्नीर ग्रोवर अनुसार-पिछले 14 साल में एकमात्र उपलब्धि थी UPI

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