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धानुक समाज की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक चेतना – ‘मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत’ के संदर्भ में

Dr. Birendra Kumar ‘Chandrasakhi’भारतीय समाज की सांस्कृतिक संरचना केवल राजाओं, साम्राज्यों और दरबारी इतिहास से निर्मित नहीं हुई, बल्कि उन लोकसमुदायों ने भी इसे आकार दिया जिन्होंने सदियों तक श्रम, लोकगीत, कृषि, परंपराओं और सामाजिक जीवन को जीवित रखा। धानुक समाज ऐसा ही एक महत्वपूर्ण समुदाय है, जिसकी भूमिका भारतीय लोकजीवन में अत्यंत गहरी रही है, लेकिन मुख्यधारा के इतिहास और साहित्य में उसे अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया। भारत की लोकसंस्कृति केवल लोकगीतों, मेलों और परंपराओं तक सीमित नहीं है; यह उन समुदायों की जीवित स्मृति है जिन्होंने सदियों तक अपनी मेहनत, कला, संगीत और सामाजिक अनुभवों से भारतीय समाज की सांस्कृतिक नींव को मजबूत किया। दुर्भाग्य से इतिहास लेखन में कई समुदायों की भूमिका को वह स्थान नहीं मिला जिसकी वे वास्तविक रूप से अधिकार रखते थे। धानुक समाज भी उन्हीं समुदायों में शामिल है। ऐसे समय में डॉ. बीरेन्द्र कुमार चन्द्रसखी की पुस्तक “मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत” केवल एक क्षेत्रीय सांस्कृतिक अध्ययन नहीं, बल्कि धानुक समाज सहित उपेक्षित समुदायों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित करने वाला गंभीर दस्तावेज बनकर सामने आती है।

डॉ. चन्द्रसखी – लोकजीवन से निकला एक सांस्कृतिक साधक
11 सितम्बर 1964 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जनपद के नगलाभगी (लहराएमनीपुर) क्षेत्र में जन्मे डॉ. बीरेन्द्र कुमार ‘चन्द्रसखी’ का जीवन लोकसंस्कृति और साहित्य के प्रति समर्पण का उदाहरण है। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े चन्द्रसखी ने बचपन से ही लोकगीतों, नौटंकी, सांगीत, मेलों और लोकपरंपराओं को बहुत निकट से देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनके साहित्य और शोध की आत्मा बने। उन्होंने हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेज़ी में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की तथा हिन्दी में पी-एच.डी. कर लोकसाहित्य और सांस्कृतिक अध्ययन को अकादमिक गंभीरता प्रदान की। हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, पंजाबी और लोकभाषाओं पर उनकी मजबूत पकड़ उनके लेखन को विशेष गहराई देती है।

वे केवल लेखक नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति के दस्तावेजकार हैं—ऐसे साहित्यकार जो गाँव की स्मृतियों, लोकगीतों और उपेक्षित समुदायों की सांस्कृतिक चेतना को शब्दों में सुरक्षित रखने का कार्य कर रहे हैं। भारतीय जातीय संरचना में धानुक समाज को लंबे समय तक केवल श्रम और कृषि से जोड़कर देखा गया। लेकिन डॉ. चन्द्रसखी इस संकीर्ण दृष्टिकोण को तोड़ते हैं। वे अपनी पुस्तक में यह स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं कि धानुक समाज केवल खेतों या श्रमिक जीवन तक सीमित समुदाय नहीं था, बल्कि वह लोकसंस्कृति, लोकसंगीत, सामाजिक संरचना और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का सक्रिय भागीदार रहा है।

इनकी पुस्तक “मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत” में धानुक समाज के लोकगीतों, पारंपरिक संगीत, लोकरीतियों और सांस्कृतिक व्यवहारों का उल्लेख अत्यंत सम्मानजनक ढंग से किया गया है। लेखक यह संकेत देते हैं कि भारतीय लोकसंस्कृति की वास्तविक आत्मा उन समुदायों में जीवित रही जिन्होंने पीढ़ियों तक अपनी मौखिक परंपराओं को संरक्षित रखा।

पुस्तक का सबसे उल्लेखनीय पक्ष वह है जहाँ लेखक राजा जयचंद के ऐतिहासिक पुनर्पाठ का प्रयास करते हैं। लोककथाओं में “विश्वासघाती” के रूप में प्रस्तुत किए गए जयचंद को लेखक एक ऐसे शासक के रूप में चित्रित करते हैं जिसकी प्रशासनिक और सैन्य संरचना में विविध समुदायों को स्थान प्राप्त था। लेखक के अनुसार जयचंद की सेना और प्रशासन में तेली, तमोली, धानुक, पारसी और तातारी जैसे समुदायों को उच्च पदों पर स्थान दिया गया था। धानुक समाज के संदर्भ में यह उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस ऐतिहासिक धारणा को चुनौती देता है जिसमें वंचित जातियों को केवल सामाजिक पायदान के निचले हिस्से तक सीमित कर दिया गया था। यह प्रस्तुति धानुक समाज को इतिहास के सक्रिय सहभागी के रूप में स्थापित करती है और उनके सामाजिक योगदान को सम्मानपूर्वक सामने लाती है।

डॉ. चन्द्रसखी की पुस्तक में धानुक समाज से जुड़े लोकगीतों और सांगीतिक परंपराओं का विशेष उल्लेख मिलता है। धानुक समाज के लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहे, बल्कि वे सामुदायिक स्मृति, श्रम संस्कृति और सामाजिक अनुभवों की अभिव्यक्ति रहे हैं। खेतों में काम करते समय गाए जाने वाले गीत, विवाह संस्कारों के लोकगान, मौसमी पर्वों के सामूहिक गीत और पारंपरिक नृत्य—ये सब धानुक समाज की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रहे हैं। लेखक इन गीतों को केवल “लोक मनोरंजन” नहीं मानते, बल्कि उन्हें सामाजिक इतिहास का जीवित दस्तावेज मानते हैं। यह दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय लोकसाहित्य का बड़ा हिस्सा उन्हीं समुदायों से निकला जिन्हें सामाजिक रूप से लंबे समय तक हाशिए पर रखा गया।

“मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत” का सबसे प्रभावशाली पक्ष यह है कि यह धानुक समाज के भीतर सांस्कृतिक आत्मगौरव की भावना को पुनर्जीवित करती है। लेखक विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों और जातीय अध्ययनों के माध्यम से यह संकेत देते हैं कि धानुक समाज केवल कृषि आधारित समुदाय नहीं था; उसकी भूमिका प्रशासन, युद्ध, कला और सांस्कृतिक जीवन में भी रही है। इतिहास में उपेक्षित समुदायों के लिए यह पुनर्पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह उन्हें केवल पीड़ित पहचान तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें समाज के सक्रिय निर्माता के रूप में प्रस्तुत करता है।

पुस्तक में कवि राजशेखर और उनकी प्रसिद्ध कृति कर्पूरमंजरी का उल्लेख भी धानुक समाज के संदर्भ में महत्वपूर्ण बन जाता है। लेखक यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि भारतीय साहित्यिक परंपराओं में धानुकों का उल्लेख पूरी तरह अनुपस्थित नहीं था। इससे यह संकेत मिलता है कि यह समुदाय सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना का जाना-पहचाना हिस्सा रहा है। यह साहित्यिक संदर्भ धानुक समाज की ऐतिहासिक उपस्थिति को और अधिक मजबूत बनाता है।

पुस्तक में शीतला माता जैसी लोकदेवियों के संदर्भ भी महत्वपूर्ण हैं। धानुक समाज सहित उत्तर भारत के अनेक समुदायों में लोकदेवियों की पूजा सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। लेखक यह दिखाते हैं कि मैनपुरी से लेकर बिहार तक लोकविश्वासों की समानता भारतीय लोकसंस्कृति की एकता को दर्शाती है। धानुक समाज के संदर्भ में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकदेवियों और ग्रामपरंपराओं ने सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई।

डॉ. चन्द्रसखी केवल सांस्कृतिक गौरव का वर्णन नहीं करते, बल्कि सामाजिक अन्याय और ऐतिहासिक विषमताओं की आलोचना भी करते हैं। उन्होंने स्मृति आधारित सामाजिक संरचनाओं और शूद्रों के प्रति कठोर व्यवहार की आलोचनात्मक चर्चा की है। धानुक समाज के संदर्भ में यह विमर्श इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पुस्तक केवल अतीत की प्रशंसा नहीं करती, बल्कि उन ऐतिहासिक परिस्थितियों को भी सामने लाती है जिन्होंने कई समुदायों को सामाजिक रूप से पीछे धकेला।

पुस्तक का एक बड़ा संदेश यह भी है कि यदि लोकसमुदाय अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों को भूल जाएंगे, तो उनकी पहचान धीरे-धीरे कमजोर हो जाएगी। डॉ. चन्द्रसखी मानते हैं कि लोकगीत, लोकभाषाएँ, जातीय परंपराएँ और सामुदायिक इतिहास केवल अतीत की बातें नहीं हैं; वे आने वाली पीढ़ियों के आत्मगौरव और सांस्कृतिक दिशा की आधारशिला हैं। धानुक समाज जैसे समुदायों के लिए यह पुस्तक केवल साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का दस्तावेज बन जाती है।

“मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत” धानुक समाज के इतिहास, लोकसंस्कृति और सामाजिक योगदान को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है। डॉ. चन्द्रसखी ने इस पुस्तक के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि धानुक समाज केवल सामाजिक संरचना का एक हिस्सा नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण संवाहक रहा है। यह पुस्तक धानुक समाज को इतिहास के हाशिए से निकालकर सांस्कृतिक विमर्श के केंद्र में स्थापित करने का गंभीर प्रयास करती है। आज जब समाज अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है, तब ऐसी कृतियाँ केवल पुस्तकें नहीं रहतीं—वे समुदायों की स्मृति, आत्मगौरव और सांस्कृतिक पहचान की आवाज़ बन जाती हैं। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि यह किताब सिर्फ एक जाति विशेष की व्याख्या या उसकी संस्कृति के बारे में बात नहीं करता है वह पूरी मैनपुरी जनपद की सांस्कृतिक विरासत की थाती है और हो सकता है यह एतिहासिक साक्ष्यों की गलियारों में एक महत्वपूर्ण किताब बनकर उभरें।
शशि धर कुमार

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Dhanuk Samaj and Politicians

मैं हमेशा लिखता रहा हूँ की बिना राजनीती के हम अपने समाज के उत्थान के लिए किसी भी तरह का नीति नहीं बना सकते है और क्यों हमें अपने समाज के राजनेताओं से दूर रहना चाहिए इसके पीछे कई कारण है। हमारी जाती के लोग अपने जाति आधारित नेताओं के साथ उठने में काफी गर्व महसूस करते है। उन्हें लगता है कभी तो उनका भला हो जायेगा लेकिन ऐसा होता नहीं है बहुजन और पिछड़ों के नेताओं में इतनी ताक़त नहीं होती है की वे किसी भी बातो को बहुजनों की हितों की बातें वे खुलकर रख सके ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि उन्हें लगता है उनकी टिकट छीन जाएगी और यही वे सबसे बड़ी गलती कर जाते है। क्योंकि टिकट देने वालों को लगता है जो अपने समाज के लोगो के हितों की बातों को नहीं उठा सकता है वह हमारे लिए किसी भी विरोध में साथ कैसे खड़ा हो सकता है आपके विरोध करने की क्षमता का वहां से पता चलता है। हर बात में हमारे नेताओं की जी-हुजूरी जग जाहिर है वे अपने नेताओं के बारे में सार्वजनिक तौर पर लिखने और बोलने का प्रयास करते रहते है लेकिन उनके नेता इन्हे छोटे से छुटभैया नेता समझ कर जब जरुरत हो मंचासीन कर लेते है जब जरुरत ना हो मंच तो क्या उन्हें दूर दूर भी फटकने नहीं देते है। लेकिन इनकी मोटी बुद्धि में यह बात कभी नहीं आनी है और ना ही आएगी।

इसीलिए मैं अपने सभी युवा साथियों से आग्रह करता हूँ की वे अपना अस्तित्व ढूंढने का प्रयास करे चाहे जहाँ भी मिले वही जाइये लेकिन इज़्ज़त के साथ बोलने और सुनने वाली जगह चुनिए और मुखर होकर बोलिये जब दूसरे नेता अपने जातिहित की बात करते एक बार भी नहीं सोचते है तो आप क्यों सोचे। आप अपने समाज के वोटो को यूं ही नीलाम मत करिये सबसे कहिये अपने विवेकानुसार अपने वोट का प्रयोग करे। क्योंकि आज जिसके लिए वोट के जुगाड़ में आप खड़े है जीतते ही वे कहेंगे आप कौन क्योंकि उनके बच्चे पढ़ रहे है विदेश में और आपके बच्चों को विद्यालय भी नसीब नहीं कभी शिक्षक जनगणना कराने में व्यस्त कर दिए जाते है तो कभी बाढ़ या कोरोना के कारण विद्यालय को कैंप बना दिया जाता है कभी चुनाव में भेज दिया जाता है तो कभी गर्मी छुट्टी फिर कभी ठंढी की छुट्टी या फिर बाढ़ की छुट्टी, आपके बच्चो के भविष्य में पढ़ना नहीं लिखा हो वे ऐसा हर प्रकार से सोचने में लगे रहते है और गलती से हमारे जाति के नेता विधायक बन भी जाए तो उन्हें लगता है वे देश के सर्वोच्च स्थान पर पहुँच गए है फिर उनकी फितरत जाग जाती है पहले वे आपको सुबह शाम आपका हाल चाल जानने को फ़ोन करते थे और अब आप फ़ोन करे तो वे हमेशा व्यस्त नज़र आते है और गलती से उनके दरबार किसी से कहलवा भी भेजा की आपने याद किया है तो वे निर्लज्जता से कहते है आप कौन आपको तो पहचानते ही नहीं है। जब मंच पर खड़े होंगे तो बड़ी बड़ी बातें और लेकिन जाति के नाम पर एक काम इनसे नहीं होता है तब वह प्रोटोकॉल के खिलाफ हो जाता है और तब वे सभी जातियों और सभी धर्मो के राजनेता हो जाते है।

जब इनके पास कुछ नहीं होता है तो यही जाति के निम्न लोग उनके लिए हर संभव मदद कर इन्हें राजनीती में आगे बढाने का काम करते है अपने पॉकेट से अपने बचत के पैसे से इनके लिए प्रचार कर इन्हें आगे बढाने का हर संभव प्रयास करते है लेकिन जीतने के बाद ना तो इनके अन्दर शर्म बची होती है और ना ही हया नाम की कोई ऐसी चीज जिनके पीछे ये छिप पाये। तब ये लोग सिर्फ अपने और अपने चार परिवार के बारे में सोचते है की कैसे आगे की तीन पीढी को सही किया जाय लेकिन इन्हें यह नहीं पता होता है पैसा ऐसा चीज है जो जिस प्रकार कमाया जाता है उसी प्रकार चला जाता है भले आपके जीते जी लोग आपके मूंह पर कुछ ना बोलेन लेकिन आपके मरने के बाद आपकी बातें अवश्य होंगी की आपने विधायक या सांसद बनने से पहले और बाद में क्या और किसके साथ कैसा बर्ताव किया था और यकीन मानिए वही पूंजी है वही आपकी पहचान साबित करेगी और लोग यह भी कहने से नहीं चुकेंगे की आपने अपनी जाति की भावनाओं को सीढी बनाकार अपना और अपने परिवार की भलाई सोची तब आपकी आने वाली पीढी को यह अंदाजा अवश्य लगेगा की आपने अपने जीवन में क्या कमाया है और क्या देकर जा रहे है। पैसा बचाने के लिए भी पढ़ाई आवश्यक है यह हमेशा समझने की जरुरत है अगर आपकी अगली पीढी अपने पैसे के दम पर सोच रही है कुछ भी कर लेंगे खत्म नहीं होने वाला है तो यह दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है।

हमें ऐसे नेताओं को पहचानने की आवश्यकता है और क्यों मैं ऐसे नेताओं से दूर रहने की सलाह देता हूँ:
१) जीतने से पहले आपके साथ हमेशा संपर्क में रहते है और जीतने के बाद आपसे बात भी नहीं करते है और आपसे दुरी बना कर रखते है।
२) जीतने से पहले समाज के साथ उठना बैठना करते है बाद में वे सभी जातियों के एकमात्र सर्वमान्य नेता कहलाने लग जाते है।
३) जीतने से पहले समाज के सम्मेलनों में जाते है लेकिन जीतने के बाद वे नहीं जाते है।
४) जीतने से पहले समाज के हर शिक्षित व्यक्ति को साथ लेकर चलने की बात करते है और जीतने के बाद उन्हें नहीं पता होता है की हमारे समाज के शिक्षित लोग कहाँ कहाँ पर है।
५) जीतने से पहले समाज का आखिरी पायदान पर बैठे व्यक्ति के बीच जाने में कोई समस्या नहीं है लेकिन जीतने के बाद तो रिश्तेदारों तक से दुरी बना लेते है।
६) जीतने से पहले आपके हर व्हात्सप्प सन्देश कर उत्तर देंगे जीतने के बाद वे व्यस्त हो जाते है और उनके पास समय का आभाव हो जाता है।
७) जीतने से पहले हर ठेके पर अपने लोगो के साथ चलते है लेकिन जीतने के बाद अपने लोगो को नहीं देकर दूसरों को देते है क्यों बांकी आप समझदार है।
८) जीतने से पहले उन्हें शिक्षा, बेरोजगारी और समाज में फैले कुव्यवस्था के ऊपर बोलना क्रांतिकारी लगता है लेकिन जीतने के बाद यह अपने नेताओं के खिलाफ जाना लगता है।
९) जीतने से पहले आरक्षण व्यवस्था से जाति की समाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार संभव है लेकिन जीतने के बाद इसपर बोलना उनके पार्टी लाइन के खिलाफ होगा।
१०) जीतने से पहले समाज की हर समस्या उनकी समस्या है लेकिन जीतने के बाद समाज के हर व्यक्ति की समस्या उनकी अपनी नहीं हो सकती है।

आप उपरोक्त सभी बातों पर अपने नेताओं को परखिये फिर बताइए की क्या आपका नेता उपरोक्त बातों पर खड़ा उतरता है या कही ना कही वे भी इसी दस मुख्य बिन्दुओं पर अटक जा रहे है तो आपको सोचने की आवश्यकता है। आज आपका लगता होगा अगली बार इसे नहीं जिताएंगे और अगर उनका अपनी पार्टी से पत्ता साफ़ भी हो गया तो वे दूसरी पार्टी में जाकर अपने लिए टिकट हासिल कर लेंगे क्योंकि सब कुछ पैसे का खेल हो गया है और आपके पास आयेंगे और रोना रोयेंगे की पहली बार जीतने की वजह से उन्हें कुछ भी पता नहीं चला इस बार जिताइये समाज का पूरा भला करेंगे और फिर आप इनके चापलूसी भरी बातों में आकर इनको वोट देकर भेज देंगे और फिर वही होगा जो पहले से होता आया है और यही पिछले ७५ सालों में हुआ है आपके साथ सिर्फ और सिर्फ छलावा और आगे भी होता रहेगा बेह्तर है जितना जल्दी संभलेंगे उतना जल्दी समाज का भला हो पायेगा।
धन्यवाद!
शशि धर कुमार
नोट: सर्वाधिकार सुरक्षित।

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Who is responsible – जिम्मेदार कौन?

हमारे धानुक समाज के संगठन पटना, नालंदा और मिथिला के अलावा किसी और जिले के बारे में नहीं सोच पा रहे है। आजकल इसी क्षेत्र में कुछ ज्यादा ही तितलियों के उड़ने की ख़बरें आ रही है जो दो काम करती है एक तो हवा में ध्वनि प्रदुषण और दुसरा फसलों का सत्यानाश और अपने समाज के लोग भी वही करने में लगे हुए है वे समाज की भलाई के लिए क्या कदम उठने चाहिए वे तो सोच नहीं पाते साथ में सामाजिक ताने बाने को छिन्न भिन्न अवश्य कर रहे है। कोई कहता है हम राजनैतिक संगठन में नहीं है लेकिन उनके लोग लगातार राजनैतिक प्लेटफार्म पर नज़र आते रहते है उनके फेसबुक टाइमलाइन को देखिये तो पता चलता है वे सिर्फ विद्वेष फैलाने के काम में लगे हुए है चाहे वो धार्मिक हो या जातिगत कही से जातिगत भलाई या उनके वास्तविक उत्थान की बात नहीं हो पा रही है। समाज के जो पढ़े लिखे लोग है उन्हें यह तक नहीं पता है की बिहार के किस जिले में किस प्रखंड में कितनी संख्या में समाज के लोग है या किस किस विधानसभा में हम खेल अपने पाले में लाने का माद्दा रखते है। हर जिले में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक समस्या का स्तर अलग अलग है जो हमारे तथाकथित कर्त्ता-धर्ता इन बातों को समझने में नाकाम रहे है और आप इसको ऐसे समझ सकते है की वे इसका बौद्धिक सर्वेक्षण तक नहीं करवा पाए जमीनी सर्वेक्षण तो दूर की बात है किन्ही से पूछिए तो कहेंगे की हमारी संख्या इतनी लाख है हम किसी को भी हिलाने का दम रखते है लेकिन जब उनसे पूछिए की किस जिले में कितने धानुक होंगे तो बोलती बंद, सवाल है क्यों नहीं १९३१ के जनगणना के अनुसार ही अनुमानित प्रोजेक्शन के आधार अपनी जनसंख्या कितनी हो उसके बारे में सोचा जाय, क्यों नहीं जिलावार इसके बारे में प्रोजेक्शन के आधार संख्या पता की जाय, लेकिन समस्या है की हमारे नेतागण को इन बातों से कोई मतलब नहीं है।

सभी लोग अभी भी सिर्फ मगध और मिथिला में फोकस किये हुए है जो धानुक की एक बड़ी संख्या कोशी क्षेत्र में है उनके बारे में आज तक कोई धानुक संगठन और ना ही कोई नेता बात कर पाया। कुछ लोग अच्छे पढ़े लिखे है उन्हें पता भी है इसका उपयोग कैसे किया जा सकता है लेकिन वे भी नाकाम लग रहे है।

हमारे समाज के लोग जय हो, जय हो, करने में लगे रहते है लेकिन जो संवेदनशील होकर लिखते है उनके बारे में ना तो समाज का कोई नेता बात करना चाहता है ना ही किसी साहित्यिक व्यक्ति की सुधि लेना चाहता है। बस हर व्यक्ति को या तो MLA बनना है या MP बनना। इससे समाज में धरातल पर आमूल चूल परिवर्तन संभव नही है, ना ही किसी नेता के पास कोई खाका नज़र आता है कि वे समाज में शिक्षा को लेकर जो अदूरदर्शिता है उसके बारे में क्या सोच रहा है और नेताओं को तो वैसे भी सोचना नही है। धानुक का जातीय संगठन इतना है कि हर किसी संगठन को कोई ना कोई नेता अपने पॉकेट में लेकर घूम रहा होता है। संगठन के काम को लेकर इतनी अदूरदर्शिता है की कोई भविष्य नही देख रहा है, ना नौकरी बची है ना ही आरक्षण क्योंकि आरक्षण को निजीकरण ने इस तरह अपने अदंर समाहित किया हुआ है कि उसका वजूद ही खत्म नज़र आ रहा है। हर जगह ओबीसी को NFS (नॉट फाउंड सूटेबल) के नाम पर नौकरी नही दी जा रही है। ओबीसी से ज्यादा सीट किसी भी वैकेंसी में EWS की होती है उसपर किसी की कोई नज़र नही है।

लेकिन हमारे नेताओं को बस जिसकी जितनी संख्या उतनी भागीदारी पर सिर्फ MP या MLA बनने की चिंता है। इससे समाज की वास्तविक भलाई तो मुश्किल है साथ में ऐसे नेता अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित तो कर ले रहे है लेकिन समाज के बच्चों का ना तो वर्तमान सुरक्षित है ना ही भविष्य सभी नेताओं की अपनी अपनी बात है की कैसे वे, ये जो वोट है उसको सुरक्षित किया जाय और उसी की जद्दोजहद है यह पूरी की पूरी कवायद। हमारे बच्चें तो पढ़ने से इतना दूर भागते है की उन्हें लगता है इन नेताओं के आगे पीछे करने से उनका या उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। ऐसा नहीं, मैं सभी बच्चो से अपील करता हूँ वे इस पुरे खेल को समझे और आप कहाँ और किस भंवर जाल में फंस रहे है आपको पता नहीं चल रहा है आपके लिए सिर्फ और सिर्फ आपके पडोसी स्वजातीय भाई ही खड़ा हो सकता है और कोई नहीं। आपको कोई भी नेता ना तो यह बताएगा की वैकेंसी क्यों नहीं निकल रही है ना ही यह बताएगा की ओबीसी की वैकेंसी NFS (नॉट फाउंड सूटेबल) के नाम पर कहाँ जा रहा है और ना ही वे यह बताएंगे ओबीसी से ज्यादा सीट किसी भी वैकेंसी में EWS की क्यों होती है। इसमें भी दो बातें है एक तो उन्हें खुद नहीं पता और अगर पता भी हो तो वे नहीं बताएंगे क्योंकि इससे उनकी राजनीती पर असर पड़ेगा।
धन्यवाद।
शशि धर कुमार
नोट: सर्वाधिकार सुरक्षित।

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