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धानुक समाज की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक चेतना – ‘मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत’ के संदर्भ में

Dr. Birendra Kumar ‘Chandrasakhi’भारतीय समाज की सांस्कृतिक संरचना केवल राजाओं, साम्राज्यों और दरबारी इतिहास से निर्मित नहीं हुई, बल्कि उन लोकसमुदायों ने भी इसे आकार दिया जिन्होंने सदियों तक श्रम, लोकगीत, कृषि, परंपराओं और सामाजिक जीवन को जीवित रखा। धानुक समाज ऐसा ही एक महत्वपूर्ण समुदाय है, जिसकी भूमिका भारतीय लोकजीवन में अत्यंत गहरी रही है, लेकिन मुख्यधारा के इतिहास और साहित्य में उसे अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया। भारत की लोकसंस्कृति केवल लोकगीतों, मेलों और परंपराओं तक सीमित नहीं है; यह उन समुदायों की जीवित स्मृति है जिन्होंने सदियों तक अपनी मेहनत, कला, संगीत और सामाजिक अनुभवों से भारतीय समाज की सांस्कृतिक नींव को मजबूत किया। दुर्भाग्य से इतिहास लेखन में कई समुदायों की भूमिका को वह स्थान नहीं मिला जिसकी वे वास्तविक रूप से अधिकार रखते थे। धानुक समाज भी उन्हीं समुदायों में शामिल है। ऐसे समय में डॉ. बीरेन्द्र कुमार चन्द्रसखी की पुस्तक “मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत” केवल एक क्षेत्रीय सांस्कृतिक अध्ययन नहीं, बल्कि धानुक समाज सहित उपेक्षित समुदायों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित करने वाला गंभीर दस्तावेज बनकर सामने आती है।

डॉ. चन्द्रसखी – लोकजीवन से निकला एक सांस्कृतिक साधक
11 सितम्बर 1964 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जनपद के नगलाभगी (लहराएमनीपुर) क्षेत्र में जन्मे डॉ. बीरेन्द्र कुमार ‘चन्द्रसखी’ का जीवन लोकसंस्कृति और साहित्य के प्रति समर्पण का उदाहरण है। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े चन्द्रसखी ने बचपन से ही लोकगीतों, नौटंकी, सांगीत, मेलों और लोकपरंपराओं को बहुत निकट से देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनके साहित्य और शोध की आत्मा बने। उन्होंने हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेज़ी में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की तथा हिन्दी में पी-एच.डी. कर लोकसाहित्य और सांस्कृतिक अध्ययन को अकादमिक गंभीरता प्रदान की। हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, पंजाबी और लोकभाषाओं पर उनकी मजबूत पकड़ उनके लेखन को विशेष गहराई देती है।

वे केवल लेखक नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति के दस्तावेजकार हैं—ऐसे साहित्यकार जो गाँव की स्मृतियों, लोकगीतों और उपेक्षित समुदायों की सांस्कृतिक चेतना को शब्दों में सुरक्षित रखने का कार्य कर रहे हैं। भारतीय जातीय संरचना में धानुक समाज को लंबे समय तक केवल श्रम और कृषि से जोड़कर देखा गया। लेकिन डॉ. चन्द्रसखी इस संकीर्ण दृष्टिकोण को तोड़ते हैं। वे अपनी पुस्तक में यह स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं कि धानुक समाज केवल खेतों या श्रमिक जीवन तक सीमित समुदाय नहीं था, बल्कि वह लोकसंस्कृति, लोकसंगीत, सामाजिक संरचना और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का सक्रिय भागीदार रहा है।

इनकी पुस्तक “मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत” में धानुक समाज के लोकगीतों, पारंपरिक संगीत, लोकरीतियों और सांस्कृतिक व्यवहारों का उल्लेख अत्यंत सम्मानजनक ढंग से किया गया है। लेखक यह संकेत देते हैं कि भारतीय लोकसंस्कृति की वास्तविक आत्मा उन समुदायों में जीवित रही जिन्होंने पीढ़ियों तक अपनी मौखिक परंपराओं को संरक्षित रखा।

पुस्तक का सबसे उल्लेखनीय पक्ष वह है जहाँ लेखक राजा जयचंद के ऐतिहासिक पुनर्पाठ का प्रयास करते हैं। लोककथाओं में “विश्वासघाती” के रूप में प्रस्तुत किए गए जयचंद को लेखक एक ऐसे शासक के रूप में चित्रित करते हैं जिसकी प्रशासनिक और सैन्य संरचना में विविध समुदायों को स्थान प्राप्त था। लेखक के अनुसार जयचंद की सेना और प्रशासन में तेली, तमोली, धानुक, पारसी और तातारी जैसे समुदायों को उच्च पदों पर स्थान दिया गया था। धानुक समाज के संदर्भ में यह उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस ऐतिहासिक धारणा को चुनौती देता है जिसमें वंचित जातियों को केवल सामाजिक पायदान के निचले हिस्से तक सीमित कर दिया गया था। यह प्रस्तुति धानुक समाज को इतिहास के सक्रिय सहभागी के रूप में स्थापित करती है और उनके सामाजिक योगदान को सम्मानपूर्वक सामने लाती है।

डॉ. चन्द्रसखी की पुस्तक में धानुक समाज से जुड़े लोकगीतों और सांगीतिक परंपराओं का विशेष उल्लेख मिलता है। धानुक समाज के लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहे, बल्कि वे सामुदायिक स्मृति, श्रम संस्कृति और सामाजिक अनुभवों की अभिव्यक्ति रहे हैं। खेतों में काम करते समय गाए जाने वाले गीत, विवाह संस्कारों के लोकगान, मौसमी पर्वों के सामूहिक गीत और पारंपरिक नृत्य—ये सब धानुक समाज की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रहे हैं। लेखक इन गीतों को केवल “लोक मनोरंजन” नहीं मानते, बल्कि उन्हें सामाजिक इतिहास का जीवित दस्तावेज मानते हैं। यह दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय लोकसाहित्य का बड़ा हिस्सा उन्हीं समुदायों से निकला जिन्हें सामाजिक रूप से लंबे समय तक हाशिए पर रखा गया।

“मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत” का सबसे प्रभावशाली पक्ष यह है कि यह धानुक समाज के भीतर सांस्कृतिक आत्मगौरव की भावना को पुनर्जीवित करती है। लेखक विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों और जातीय अध्ययनों के माध्यम से यह संकेत देते हैं कि धानुक समाज केवल कृषि आधारित समुदाय नहीं था; उसकी भूमिका प्रशासन, युद्ध, कला और सांस्कृतिक जीवन में भी रही है। इतिहास में उपेक्षित समुदायों के लिए यह पुनर्पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह उन्हें केवल पीड़ित पहचान तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें समाज के सक्रिय निर्माता के रूप में प्रस्तुत करता है।

पुस्तक में कवि राजशेखर और उनकी प्रसिद्ध कृति कर्पूरमंजरी का उल्लेख भी धानुक समाज के संदर्भ में महत्वपूर्ण बन जाता है। लेखक यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि भारतीय साहित्यिक परंपराओं में धानुकों का उल्लेख पूरी तरह अनुपस्थित नहीं था। इससे यह संकेत मिलता है कि यह समुदाय सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना का जाना-पहचाना हिस्सा रहा है। यह साहित्यिक संदर्भ धानुक समाज की ऐतिहासिक उपस्थिति को और अधिक मजबूत बनाता है।

पुस्तक में शीतला माता जैसी लोकदेवियों के संदर्भ भी महत्वपूर्ण हैं। धानुक समाज सहित उत्तर भारत के अनेक समुदायों में लोकदेवियों की पूजा सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। लेखक यह दिखाते हैं कि मैनपुरी से लेकर बिहार तक लोकविश्वासों की समानता भारतीय लोकसंस्कृति की एकता को दर्शाती है। धानुक समाज के संदर्भ में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकदेवियों और ग्रामपरंपराओं ने सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई।

डॉ. चन्द्रसखी केवल सांस्कृतिक गौरव का वर्णन नहीं करते, बल्कि सामाजिक अन्याय और ऐतिहासिक विषमताओं की आलोचना भी करते हैं। उन्होंने स्मृति आधारित सामाजिक संरचनाओं और शूद्रों के प्रति कठोर व्यवहार की आलोचनात्मक चर्चा की है। धानुक समाज के संदर्भ में यह विमर्श इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पुस्तक केवल अतीत की प्रशंसा नहीं करती, बल्कि उन ऐतिहासिक परिस्थितियों को भी सामने लाती है जिन्होंने कई समुदायों को सामाजिक रूप से पीछे धकेला।

पुस्तक का एक बड़ा संदेश यह भी है कि यदि लोकसमुदाय अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों को भूल जाएंगे, तो उनकी पहचान धीरे-धीरे कमजोर हो जाएगी। डॉ. चन्द्रसखी मानते हैं कि लोकगीत, लोकभाषाएँ, जातीय परंपराएँ और सामुदायिक इतिहास केवल अतीत की बातें नहीं हैं; वे आने वाली पीढ़ियों के आत्मगौरव और सांस्कृतिक दिशा की आधारशिला हैं। धानुक समाज जैसे समुदायों के लिए यह पुस्तक केवल साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का दस्तावेज बन जाती है।

“मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत” धानुक समाज के इतिहास, लोकसंस्कृति और सामाजिक योगदान को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है। डॉ. चन्द्रसखी ने इस पुस्तक के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि धानुक समाज केवल सामाजिक संरचना का एक हिस्सा नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण संवाहक रहा है। यह पुस्तक धानुक समाज को इतिहास के हाशिए से निकालकर सांस्कृतिक विमर्श के केंद्र में स्थापित करने का गंभीर प्रयास करती है। आज जब समाज अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है, तब ऐसी कृतियाँ केवल पुस्तकें नहीं रहतीं—वे समुदायों की स्मृति, आत्मगौरव और सांस्कृतिक पहचान की आवाज़ बन जाती हैं। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि यह किताब सिर्फ एक जाति विशेष की व्याख्या या उसकी संस्कृति के बारे में बात नहीं करता है वह पूरी मैनपुरी जनपद की सांस्कृतिक विरासत की थाती है और हो सकता है यह एतिहासिक साक्ष्यों की गलियारों में एक महत्वपूर्ण किताब बनकर उभरें।
शशि धर कुमार

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Bhim Rao Ambdkar – भीम राव अंबेडकर

भारत रत्न भीमराव रामजी आंबेडकर (१४ अप्रैल, १८९१ – ६ दिसंबर, १९५६) बाबासाहब के नाम से लोकप्रिय, भारतीय विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाजसुधारक के नाम से मशहूर बाबासाहेब की जयंती की हार्दिक बधाई!

डॉ अम्बेडकरआशा करते है बाबा साहेब द्वारा कृत संविधान हम सबको एक निश्चित और सामान अधिकार दिलाने में अभी तक कामयाब रहा होगा। मैं यहाँ उन बातो को बताना नहीं चाहता हूँ की किनकी वजह से यह नहीं मिला और किनकी वजह से यह मिला। लेकिन संविधान ने हमे बहुत कुछ ऐसा दिया है जिनसे हम अपनी ज़िन्दगी कैसे बेहतर कर सके, हम अपने अधिकारो की रक्षा कैसे करे, हमारे कर्तव्य क्या क्या है इत्यादि जो बाबा साहेब ने 70 साल पहले सोचा आज भी वह उतना ही अक्षरश सत्य है जितना 40 साल या 70 साल पहले। तो आज हमे इस बात को जानने में ज्यादा विश्वास दिखाना चाहिए की एक व्यक्ति की वजह से एक आम आदमी को इतना अच्छा संविधान मिला है, यह उनकी दूरदर्शिता का कमाल है।

आपको ध्यान रखना है की कौन क्षद्म रूप से आपको बरगलाने की कोशिश में लगा हुआ है ऐसे लोगो को बेनकाब करने की जरुरत है। क्योंकि कोई भी क्षद्म रूप किसी भी समाज के लिए कही सही नहीं होता है।

बाबा साहेब के बारे में जो आज़ादी से लेकर आजतक चित्र प्रस्तुत किया गया उसमे सिर्फ एक संविधान निर्माता के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन अगर कोई उनके प्रोफाइल को चेक करेगा तो पता चलेगा जिस व्यक्ति को राष्ट्र निर्माता के रूप में पदस्थापित करना था वह एक संविधान निर्माता के रूप में या दलित राजनीतिज्ञ के रूप में रह गए।

पंडित जी ने जब अंतरिम सरकार बनाने के लिए 32 लोगो का चयन किया था तो उसमे अम्बेडकर साहेब नहीं थे लेकिन जैसे ही उस लिस्ट को लेकर गांधीजी के पास पहुंचे तो गांधीजी ने पूछा की अम्बेडकर का नाम क्यों नहीं है तो पंडित जी और पटेल जी बगले झाँकने लगे तो गांधीजी ने एक बात कही “नेहरु एक बात बताओ की अम्बेडकर से बढ़कर कोई आज की तारीख में कानून को जानता हो, तो बताओ”।

उन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और दलितों के खिलाफ सामाजिक भेद भाव के विरुद्ध अभियान चलाया। श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री एवं भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार थे। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स दोनों ही विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने विधि, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान के शोध कार्य में ख्याति प्राप्त की। जीवन के प्रारम्भिक करियर में वह अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे एवम वकालत की। बाद का जीवन राजनीतिक गतिविधियों में बीता। 1990 में, उन्हें भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था।

शिक्षित बनो ! संगठित रहो! और संघर्ष करो!। यह सिर्फ एक नारा नहीं है अगर गौर करे तो यह एक ऐसी लाइन है जिसमे उपेक्षित समाज के जिंदगी को लिखा गया है लेकिन यहाँ ध्यान रखने वाली बात यह है की यह लाइन कही से से आगे पीछे ना होने पाए यह जैसे है वैसे ही अपनी जिंदगी में सार्थक करने का प्रयास करना चाहिए कहने का मतलब है की अगर पहली लाइन शिक्षित बनो लिखा है तो पहले शिक्षित बनिए दूसरी लाइन संगठित रहो है तो पहले आपको शिक्षित होना है फिर संगठित होना अगर शिक्षित होंगे तभी बिना किसी स्वार्थ के संगठित रह पायेंगे अगर शिक्षित ही नहीं बनेंगे तो संगठित होने का मतलब नहीं समझ पायेंगे। आखिर में तीसरी लाइन संघर्ष करो लिखा है तो पहले शिक्षित बनिए फिर संगठित रहिये फिर आप संघर्ष कर पाएंगे क्योंकी अगर आप शिक्षित नहीं होंगे तो संगठित नहीं हो पाएंगे और अगर बिना शिक्षित हुए संगठित होकर संघर्ष करेंगे तो आपको संघर्ष करने के बाद करना क्या है उसका मतलब नहीं समझ आएगा। तो लाइन में कही भी कोई बदलाव नहीं होना चाहिए अगर आप इसको उल्टा और अगर स्थान बदलने की कोशिश करेंगे तो भी उपेक्षित समाज का उत्थान संभव नहीं है जो लाइन है जैसे है वैसे ही अपने जीवन में ढालने का प्रयास करे तभी अगर आप उपेक्षित है या उस समाज से आता है तभी आप अपना या अपने समाज का भला कर पाएंगे।

शिक्षा ही एक मात्र उपाय है उत्थान का, उसके महत्त्व को समझिये और सबको समझाइए।

अंत में उनका एक वाक्य है जो सभी को पढ़ना चाहिए “मंदिर जाने से आपका कल्याण होगा ही, यह नही कहा जा सकता। लेकिन राजनीतिक अधिकारों का उपयोग जीवन में सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिए करना चाहिए।” – डॉ अम्बेडकर, 28 सितंबर 1932 वर्ली, मुंबई

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धन्यवाद
शशि धर कुमार

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Savitribai Phule – सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले

Savitribai-Phuleसावित्रीबाई ज्योतिराव फुले (3 जनवरी 1831 – 10 मार्च 1897) भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सुधारिका एवं मराठी कवियत्री थीं। उन्होंने अपने पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले के साथ मिलकर स्त्री अधिकारों एवं शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। वे प्रथम महिला शिक्षिका थीं। उन्हें आधुनिक मराठी काव्य का अग्रदूत माना जाता है। 1852 में उन्होंने बालिकाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की।

परिचय
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। इनके पिता का नाम खन्दोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1840 में ज्योतिबा फुले से हुआ था।

सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थीं। महात्मा ज्योतिबा को महाराष्ट्र और भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन में एक सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में माना जाता है। उनको महिलाओं और दलित जातियों को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए जाना जाता है। ज्योतिराव, जो बाद में ज्योतिबा के नाम से जाने गए सावित्रीबाई के संरक्षक, गुरु और समर्थक थे। सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना। वे एक कवियत्री भी थीं उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता था।

सामाजिक मुश्किलें
वे स्कूल जाती थीं, तो विरोधी लोग पत्थर मारते थे। उन पर गंदगी फेंक देते थे। आज से 189 साल पहले बालिकाओं के लिये जब स्कूल खोलना पाप का काम माना जाता था कितनी सामाजिक मुश्किलों से खोला गया होगा।

सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं। हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया। जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फैंका करते थे। सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं। अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से देती हैं।

विद्यालय की स्थापना
3 जनवरी 1848 में पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ उन्होंने महिलोओ के लिए एक विद्यालय की स्थापना की। एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए। तत्कालीन सरकार ने इन्हे सम्मानित भी किया। एक महिला प्रिंसिपल के लिये सन् 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती। लड़कियों की शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी। सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया, वह भी पुणे जैसे शहर में।आज औरतों को उन्हें आदर्श मानना चाहिए

निधन
10 मार्च 1897 को प्लेग के कारण सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया। प्लेग महामारी में सावित्रीबाई प्लेग के मरीज़ों की सेवा करती थीं। एक प्लेग के छूत से प्रभावित बच्चे की सेवा करने के कारण इनको भी छूत लग गया। और इसी कारण से उनकी मृत्यु हुई।

गूगल डूडल
3 जनवरी 2017 को उनके 186 वे जन्मदिवस पर गूगलने उनका गूगल डूडल प्रसिद्ध कर उन्हें अभिवादन किया है

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