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धानुक समाज की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक चेतना – ‘मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत’ के संदर्भ में

Dr. Birendra Kumar ‘Chandrasakhi’भारतीय समाज की सांस्कृतिक संरचना केवल राजाओं, साम्राज्यों और दरबारी इतिहास से निर्मित नहीं हुई, बल्कि उन लोकसमुदायों ने भी इसे आकार दिया जिन्होंने सदियों तक श्रम, लोकगीत, कृषि, परंपराओं और सामाजिक जीवन को जीवित रखा। धानुक समाज ऐसा ही एक महत्वपूर्ण समुदाय है, जिसकी भूमिका भारतीय लोकजीवन में अत्यंत गहरी रही है, लेकिन मुख्यधारा के इतिहास और साहित्य में उसे अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया। भारत की लोकसंस्कृति केवल लोकगीतों, मेलों और परंपराओं तक सीमित नहीं है; यह उन समुदायों की जीवित स्मृति है जिन्होंने सदियों तक अपनी मेहनत, कला, संगीत और सामाजिक अनुभवों से भारतीय समाज की सांस्कृतिक नींव को मजबूत किया। दुर्भाग्य से इतिहास लेखन में कई समुदायों की भूमिका को वह स्थान नहीं मिला जिसकी वे वास्तविक रूप से अधिकार रखते थे। धानुक समाज भी उन्हीं समुदायों में शामिल है। ऐसे समय में डॉ. बीरेन्द्र कुमार चन्द्रसखी की पुस्तक “मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत” केवल एक क्षेत्रीय सांस्कृतिक अध्ययन नहीं, बल्कि धानुक समाज सहित उपेक्षित समुदायों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित करने वाला गंभीर दस्तावेज बनकर सामने आती है।

डॉ. चन्द्रसखी – लोकजीवन से निकला एक सांस्कृतिक साधक
11 सितम्बर 1964 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जनपद के नगलाभगी (लहराएमनीपुर) क्षेत्र में जन्मे डॉ. बीरेन्द्र कुमार ‘चन्द्रसखी’ का जीवन लोकसंस्कृति और साहित्य के प्रति समर्पण का उदाहरण है। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े चन्द्रसखी ने बचपन से ही लोकगीतों, नौटंकी, सांगीत, मेलों और लोकपरंपराओं को बहुत निकट से देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनके साहित्य और शोध की आत्मा बने। उन्होंने हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेज़ी में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की तथा हिन्दी में पी-एच.डी. कर लोकसाहित्य और सांस्कृतिक अध्ययन को अकादमिक गंभीरता प्रदान की। हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, पंजाबी और लोकभाषाओं पर उनकी मजबूत पकड़ उनके लेखन को विशेष गहराई देती है।

वे केवल लेखक नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति के दस्तावेजकार हैं—ऐसे साहित्यकार जो गाँव की स्मृतियों, लोकगीतों और उपेक्षित समुदायों की सांस्कृतिक चेतना को शब्दों में सुरक्षित रखने का कार्य कर रहे हैं। भारतीय जातीय संरचना में धानुक समाज को लंबे समय तक केवल श्रम और कृषि से जोड़कर देखा गया। लेकिन डॉ. चन्द्रसखी इस संकीर्ण दृष्टिकोण को तोड़ते हैं। वे अपनी पुस्तक में यह स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं कि धानुक समाज केवल खेतों या श्रमिक जीवन तक सीमित समुदाय नहीं था, बल्कि वह लोकसंस्कृति, लोकसंगीत, सामाजिक संरचना और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का सक्रिय भागीदार रहा है।

इनकी पुस्तक “मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत” में धानुक समाज के लोकगीतों, पारंपरिक संगीत, लोकरीतियों और सांस्कृतिक व्यवहारों का उल्लेख अत्यंत सम्मानजनक ढंग से किया गया है। लेखक यह संकेत देते हैं कि भारतीय लोकसंस्कृति की वास्तविक आत्मा उन समुदायों में जीवित रही जिन्होंने पीढ़ियों तक अपनी मौखिक परंपराओं को संरक्षित रखा।

पुस्तक का सबसे उल्लेखनीय पक्ष वह है जहाँ लेखक राजा जयचंद के ऐतिहासिक पुनर्पाठ का प्रयास करते हैं। लोककथाओं में “विश्वासघाती” के रूप में प्रस्तुत किए गए जयचंद को लेखक एक ऐसे शासक के रूप में चित्रित करते हैं जिसकी प्रशासनिक और सैन्य संरचना में विविध समुदायों को स्थान प्राप्त था। लेखक के अनुसार जयचंद की सेना और प्रशासन में तेली, तमोली, धानुक, पारसी और तातारी जैसे समुदायों को उच्च पदों पर स्थान दिया गया था। धानुक समाज के संदर्भ में यह उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस ऐतिहासिक धारणा को चुनौती देता है जिसमें वंचित जातियों को केवल सामाजिक पायदान के निचले हिस्से तक सीमित कर दिया गया था। यह प्रस्तुति धानुक समाज को इतिहास के सक्रिय सहभागी के रूप में स्थापित करती है और उनके सामाजिक योगदान को सम्मानपूर्वक सामने लाती है।

डॉ. चन्द्रसखी की पुस्तक में धानुक समाज से जुड़े लोकगीतों और सांगीतिक परंपराओं का विशेष उल्लेख मिलता है। धानुक समाज के लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहे, बल्कि वे सामुदायिक स्मृति, श्रम संस्कृति और सामाजिक अनुभवों की अभिव्यक्ति रहे हैं। खेतों में काम करते समय गाए जाने वाले गीत, विवाह संस्कारों के लोकगान, मौसमी पर्वों के सामूहिक गीत और पारंपरिक नृत्य—ये सब धानुक समाज की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रहे हैं। लेखक इन गीतों को केवल “लोक मनोरंजन” नहीं मानते, बल्कि उन्हें सामाजिक इतिहास का जीवित दस्तावेज मानते हैं। यह दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय लोकसाहित्य का बड़ा हिस्सा उन्हीं समुदायों से निकला जिन्हें सामाजिक रूप से लंबे समय तक हाशिए पर रखा गया।

“मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत” का सबसे प्रभावशाली पक्ष यह है कि यह धानुक समाज के भीतर सांस्कृतिक आत्मगौरव की भावना को पुनर्जीवित करती है। लेखक विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों और जातीय अध्ययनों के माध्यम से यह संकेत देते हैं कि धानुक समाज केवल कृषि आधारित समुदाय नहीं था; उसकी भूमिका प्रशासन, युद्ध, कला और सांस्कृतिक जीवन में भी रही है। इतिहास में उपेक्षित समुदायों के लिए यह पुनर्पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह उन्हें केवल पीड़ित पहचान तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें समाज के सक्रिय निर्माता के रूप में प्रस्तुत करता है।

पुस्तक में कवि राजशेखर और उनकी प्रसिद्ध कृति कर्पूरमंजरी का उल्लेख भी धानुक समाज के संदर्भ में महत्वपूर्ण बन जाता है। लेखक यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि भारतीय साहित्यिक परंपराओं में धानुकों का उल्लेख पूरी तरह अनुपस्थित नहीं था। इससे यह संकेत मिलता है कि यह समुदाय सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना का जाना-पहचाना हिस्सा रहा है। यह साहित्यिक संदर्भ धानुक समाज की ऐतिहासिक उपस्थिति को और अधिक मजबूत बनाता है।

पुस्तक में शीतला माता जैसी लोकदेवियों के संदर्भ भी महत्वपूर्ण हैं। धानुक समाज सहित उत्तर भारत के अनेक समुदायों में लोकदेवियों की पूजा सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। लेखक यह दिखाते हैं कि मैनपुरी से लेकर बिहार तक लोकविश्वासों की समानता भारतीय लोकसंस्कृति की एकता को दर्शाती है। धानुक समाज के संदर्भ में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकदेवियों और ग्रामपरंपराओं ने सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई।

डॉ. चन्द्रसखी केवल सांस्कृतिक गौरव का वर्णन नहीं करते, बल्कि सामाजिक अन्याय और ऐतिहासिक विषमताओं की आलोचना भी करते हैं। उन्होंने स्मृति आधारित सामाजिक संरचनाओं और शूद्रों के प्रति कठोर व्यवहार की आलोचनात्मक चर्चा की है। धानुक समाज के संदर्भ में यह विमर्श इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पुस्तक केवल अतीत की प्रशंसा नहीं करती, बल्कि उन ऐतिहासिक परिस्थितियों को भी सामने लाती है जिन्होंने कई समुदायों को सामाजिक रूप से पीछे धकेला।

पुस्तक का एक बड़ा संदेश यह भी है कि यदि लोकसमुदाय अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों को भूल जाएंगे, तो उनकी पहचान धीरे-धीरे कमजोर हो जाएगी। डॉ. चन्द्रसखी मानते हैं कि लोकगीत, लोकभाषाएँ, जातीय परंपराएँ और सामुदायिक इतिहास केवल अतीत की बातें नहीं हैं; वे आने वाली पीढ़ियों के आत्मगौरव और सांस्कृतिक दिशा की आधारशिला हैं। धानुक समाज जैसे समुदायों के लिए यह पुस्तक केवल साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का दस्तावेज बन जाती है।

“मैंनपुरी की लोक सांस्कृतिक विरासत” धानुक समाज के इतिहास, लोकसंस्कृति और सामाजिक योगदान को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है। डॉ. चन्द्रसखी ने इस पुस्तक के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि धानुक समाज केवल सामाजिक संरचना का एक हिस्सा नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण संवाहक रहा है। यह पुस्तक धानुक समाज को इतिहास के हाशिए से निकालकर सांस्कृतिक विमर्श के केंद्र में स्थापित करने का गंभीर प्रयास करती है। आज जब समाज अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है, तब ऐसी कृतियाँ केवल पुस्तकें नहीं रहतीं—वे समुदायों की स्मृति, आत्मगौरव और सांस्कृतिक पहचान की आवाज़ बन जाती हैं। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि यह किताब सिर्फ एक जाति विशेष की व्याख्या या उसकी संस्कृति के बारे में बात नहीं करता है वह पूरी मैनपुरी जनपद की सांस्कृतिक विरासत की थाती है और हो सकता है यह एतिहासिक साक्ष्यों की गलियारों में एक महत्वपूर्ण किताब बनकर उभरें।
शशि धर कुमार

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लोकनायक कर्पुरी ठाकुर

लोकनायक कर्पुरी ठाकुर जी की जयंती 24 जनवरी को मनाया जाता है इस बार यह जयंती इसीलिए ख़ास हो जाता है क्योंकि इस वर्ष उनकी सौवीं जयंती मनाई गयी और साथ में इसी वर्ष उन्हें भारत सरकार ने मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा की है। कर्पूरी ठाकुर को लोकनायक इसीलिए कहा जाता है क्योंकि उनके फैसलों से सिर्फ बिहार नहीं दिल्ली भी सोच-विचार करने को मजबूर हो गयी थी। कर्पूरी ठाकुर जैसे लोग राजनेता नहीं प्रणेता की श्रेणी में आते है जिन्होंने सिर्फ समाज के हासिये पर जी रहे जातिगत लोगों को ऊपर उठाने की कोशिश नहीं कि वरन उन्होंने उन सभी वर्गों को ऊपर उठाने का प्रयास किया जो हासिये पर थे जैसे महिलायें और गरीब स्वर्ण।

१९६७ में बिहार के शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने मैट्रिक से अंग्रेजी को अनिवार्य विषय से हटा दिया ताकि जो लोग पिछड़ जा रहे थे अंग्रेजी अनिवार्य विषय के रूप में उन्हें सहायता मिल सके इसका व्यापक विरोध भी हुआ लेकिन वे अपने फैसले पर डटे रहे। उनकी कोशिशों के चलते ही मिशनरी स्कूलों ने हिंदी में पढ़ाना शुरू किया। यह आरोप लगाया गया है कि राज्य में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा के निम्न मानकों के कारण बिहारी छात्रों को नुकसान उठाना पड़ा। कर्पूरी ठाकुर बिहार की परंपरागत व्यवस्था में करोड़ों वंचितों की आवाज़ बने रहे।

१९७० में १६३ दिनों के कार्यकाल में कर्पूरी ठाकुर ने आठवीं तक की शिक्षा मुफ़्त की। १९७७ में दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद मुंगेरीलाल कमिशन लागू करके राज्य की नौकरियों आरक्षण लागू करने के लिए हमेशा याद किया जाता है। जब १९७७ में वे दोबारा मुख्यमंत्री बने तो एस-एसटी के अलावा ओबीसी के लिए आरक्षण लागू करने वाला बिहार देश का पहला राज्य बना था जिसमे ११ नवंबर १९७८ को उन्होंने महिलाओं के लिए तीन, ग़रीब सवर्णों के लिए तीन और पिछडों के लिए ८ फीसदी और अन्य पिछड़े वर्ग के लिए १२ फीसदी यानी कुल २६ फीसदी आरक्षण की घोषणा की थी।

जब नेता और घोटाले एक दूसरे के पूरक के रूप में जाने जाते हो उस समय भी कर्पूरी जैसे नेता भी हुए, विश्वास ही नहीं होता। उनकी ईमानदारी के कई किस्से आज भी बिहार में आपको सुनने को मिलते हैं। उनसे जुड़े कुछ लोग बताते हैं कि कर्पूरी ठाकुर जब राज्य के मुख्यमंत्री थे तो उनके रिश्ते में उनके बहनोई उनके पास नौकरी के लिए गए और कहीं सिफारिश से नौकरी लगवाने के लिए कहा। उनकी बात सुनकर कर्पूरी ठाकुर गंभीर हो गए, उसके बाद अपनी जेब से पचास रुपये निकालकर उन्हें दिए और कहा, “जाइए, उस्तरा आदि खरीद लीजिए और अपना पुश्तैनी धंधा आरंभ कीजिए।”

उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता हेमवती नंदन बहुगुणा ने अपने संस्मरण में लिखा, “कर्पूरी ठाकुर की आर्थिक तंगी को देखते हुए देवीलाल ने पटना में अपने एक हरियाणवी मित्र से कहा था – कर्पूरीजी कभी आपसे पांच-दस हज़ार रुपये मांगें तो आप उन्हें दे देना, वह मेरे ऊपर आपका कर्ज रहेगा। बाद में देवीलाल ने अपने मित्र से कई बार पूछा भी कि क्या कर्पूरीजी ने कुछ मांगा, लेकिन हर बार मित्र का जवाब होता – नहीं।” तो ऐसा उनका मापदंड था राजनीति में रहकर भी ईमानदारी से लोगों के लिए काम किया जा सकता है। राजनीति में इतना लंबा सफ़र बिताने के बाद जब वो मरे तो अपने परिवार को विरासत में देने के लिए एक मकान तक उनके नाम नहीं था। ना तो पटना में, ना ही अपने पैतृक घर में वो एक इंच जमीन जोड़ पाए।

इस आरक्षण को लागू करने के चलते वे हमेशा के लिए एक ख़ास वर्ग के दुश्मन बन गए, लेकिन कर्पूरी ठाकुर समाज के दबे पिछड़ों के हितों के लिए काम करते रहे। वो देश के पहले मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने अपने राज्य में दसवीं तक मुफ्त पढ़ाई की घोषणा की थी। उन्होंने राज्य में उर्दू को दूसरी राजकीय भाषा का दर्जा देने का काम किया जिसके खिलाफ भी एक वर्ग इतना परेशान हुआ की उन्हें पाकिस्तान का हिमायती तक कह डाला। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने राज्य के सभी विभागों में हिंदी में काम करने को अनिवार्य बना दिया था। इतना ही नहीं उन्होंने राज्य सरकार के कर्मचारियों के समान वेतन आयोग को राज्य में भी लागू करने का काम सबसे पहले किया था।

युवाओं को रोजगार देने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इतनी थी कि एक कैंप आयोजित कर ९००० से ज़्यादा इंजीनियरों और डॉक्टरों को एक साथ नौकरी दे दी थी। इतने बड़े पैमाने पर एक साथ राज्य में इसके बाद आज तक इंजीनियर और डॉक्टर बहाल नहीं हुए। उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए प्रदेश में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी थी।

“कर कर्पूरी कर पूरा, छोड़ गद्दी उठा उस्‍तरा” ऐसे नारे जब उनके उपरोक्त कार्यो के बाद लगने लगे तो समझिए कि चोट कहाँ लगी थी। आज की नौजवान पीढ़ी इन बातों को समझने में नाकाम है। यह एक नारा नही पूरे समुदाय को कहा जा रहा है कि आप यही कर सकते है। यह एक व्यंग्य है जो पूरे समुदाय के लिए है। इसी से संबंधित एक और बात है कि जब वे मैट्रिक फर्स्ट डिवीज़न से पास हुए थे तो उनके पिताजी गाँव के जमींदार के पास ले गए और जमींदार से कहा मेरा बेटा मैट्रिक में फर्स्ट डिवीज़न से पास हुआ है तो उस जमींदार ने कहा अच्छा फर्स्ट डिवीज़न से पास हुआ है फिर अपना पैर आगे कर दिया और कहा कि चलो मेरा पैर दबाओ। ऐसा ही एक और वाक़या प्रचलित है जब वे मुख्यमंत्री थे तो उनके पिताजी गाँव के जमींदार के बुलाने पर तबियत खराब होने के वजह से नही जा सके तो लठैत को भेज दिया था लाने को, फिर जिला प्रशासन को पता चला तो बाद में मुख्यमंत्री रहते इन्होंने बात वापस ले लिया क्यों, क्योंकि उन्हें पता था कि उनके पिताजी जैसे सैंकड़ो लोग आज भी इसी तरह प्रताड़ित होते है कितनो को बचाएंगे। इसीलिए उन्होंने कहा था कि “आर्थिक आजादी से कुछ नही होता जब तक समाज में सामाजिक समानता नही आएगा”। तब तक समाज में दबे कुचलों पर अत्याचार होता रहेगा।

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Bhim Rao Ambdkar – भीम राव अंबेडकर

भारत रत्न भीमराव रामजी आंबेडकर (१४ अप्रैल, १८९१ – ६ दिसंबर, १९५६) बाबासाहब के नाम से लोकप्रिय, भारतीय विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाजसुधारक के नाम से मशहूर बाबासाहेब की जयंती की हार्दिक बधाई!

डॉ अम्बेडकरआशा करते है बाबा साहेब द्वारा कृत संविधान हम सबको एक निश्चित और सामान अधिकार दिलाने में अभी तक कामयाब रहा होगा। मैं यहाँ उन बातो को बताना नहीं चाहता हूँ की किनकी वजह से यह नहीं मिला और किनकी वजह से यह मिला। लेकिन संविधान ने हमे बहुत कुछ ऐसा दिया है जिनसे हम अपनी ज़िन्दगी कैसे बेहतर कर सके, हम अपने अधिकारो की रक्षा कैसे करे, हमारे कर्तव्य क्या क्या है इत्यादि जो बाबा साहेब ने 70 साल पहले सोचा आज भी वह उतना ही अक्षरश सत्य है जितना 40 साल या 70 साल पहले। तो आज हमे इस बात को जानने में ज्यादा विश्वास दिखाना चाहिए की एक व्यक्ति की वजह से एक आम आदमी को इतना अच्छा संविधान मिला है, यह उनकी दूरदर्शिता का कमाल है।

आपको ध्यान रखना है की कौन क्षद्म रूप से आपको बरगलाने की कोशिश में लगा हुआ है ऐसे लोगो को बेनकाब करने की जरुरत है। क्योंकि कोई भी क्षद्म रूप किसी भी समाज के लिए कही सही नहीं होता है।

बाबा साहेब के बारे में जो आज़ादी से लेकर आजतक चित्र प्रस्तुत किया गया उसमे सिर्फ एक संविधान निर्माता के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन अगर कोई उनके प्रोफाइल को चेक करेगा तो पता चलेगा जिस व्यक्ति को राष्ट्र निर्माता के रूप में पदस्थापित करना था वह एक संविधान निर्माता के रूप में या दलित राजनीतिज्ञ के रूप में रह गए।

पंडित जी ने जब अंतरिम सरकार बनाने के लिए 32 लोगो का चयन किया था तो उसमे अम्बेडकर साहेब नहीं थे लेकिन जैसे ही उस लिस्ट को लेकर गांधीजी के पास पहुंचे तो गांधीजी ने पूछा की अम्बेडकर का नाम क्यों नहीं है तो पंडित जी और पटेल जी बगले झाँकने लगे तो गांधीजी ने एक बात कही “नेहरु एक बात बताओ की अम्बेडकर से बढ़कर कोई आज की तारीख में कानून को जानता हो, तो बताओ”।

उन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और दलितों के खिलाफ सामाजिक भेद भाव के विरुद्ध अभियान चलाया। श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री एवं भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार थे। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स दोनों ही विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने विधि, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान के शोध कार्य में ख्याति प्राप्त की। जीवन के प्रारम्भिक करियर में वह अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे एवम वकालत की। बाद का जीवन राजनीतिक गतिविधियों में बीता। 1990 में, उन्हें भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था।

शिक्षित बनो ! संगठित रहो! और संघर्ष करो!। यह सिर्फ एक नारा नहीं है अगर गौर करे तो यह एक ऐसी लाइन है जिसमे उपेक्षित समाज के जिंदगी को लिखा गया है लेकिन यहाँ ध्यान रखने वाली बात यह है की यह लाइन कही से से आगे पीछे ना होने पाए यह जैसे है वैसे ही अपनी जिंदगी में सार्थक करने का प्रयास करना चाहिए कहने का मतलब है की अगर पहली लाइन शिक्षित बनो लिखा है तो पहले शिक्षित बनिए दूसरी लाइन संगठित रहो है तो पहले आपको शिक्षित होना है फिर संगठित होना अगर शिक्षित होंगे तभी बिना किसी स्वार्थ के संगठित रह पायेंगे अगर शिक्षित ही नहीं बनेंगे तो संगठित होने का मतलब नहीं समझ पायेंगे। आखिर में तीसरी लाइन संघर्ष करो लिखा है तो पहले शिक्षित बनिए फिर संगठित रहिये फिर आप संघर्ष कर पाएंगे क्योंकी अगर आप शिक्षित नहीं होंगे तो संगठित नहीं हो पाएंगे और अगर बिना शिक्षित हुए संगठित होकर संघर्ष करेंगे तो आपको संघर्ष करने के बाद करना क्या है उसका मतलब नहीं समझ आएगा। तो लाइन में कही भी कोई बदलाव नहीं होना चाहिए अगर आप इसको उल्टा और अगर स्थान बदलने की कोशिश करेंगे तो भी उपेक्षित समाज का उत्थान संभव नहीं है जो लाइन है जैसे है वैसे ही अपने जीवन में ढालने का प्रयास करे तभी अगर आप उपेक्षित है या उस समाज से आता है तभी आप अपना या अपने समाज का भला कर पाएंगे।

शिक्षा ही एक मात्र उपाय है उत्थान का, उसके महत्त्व को समझिये और सबको समझाइए।

अंत में उनका एक वाक्य है जो सभी को पढ़ना चाहिए “मंदिर जाने से आपका कल्याण होगा ही, यह नही कहा जा सकता। लेकिन राजनीतिक अधिकारों का उपयोग जीवन में सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिए करना चाहिए।” – डॉ अम्बेडकर, 28 सितंबर 1932 वर्ली, मुंबई

#भीमरावअम्बेडकर #BhimraoAmbedkar #AmbedkarJayanti #धानुकसमाज #DhanukSamaj #धानुक #Dhanuk

धन्यवाद
शशि धर कुमार

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आज भी ये बच्चें इतनी मेहनत सिर्फ और सिर्फ शिक्षा पाने के लिए कर रहे है।क्या ये महानगरों के निजी विद्यालयों के स्मार्ट क्लासेज में पढ़ने वाले बच्चों से कर पाएंगे? सोचियेगा जरूर? #धानुक #धानुकसमाज #धानुकजाति #Dhanuk #dhanukसमाज ...
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#धानुकजाति में एकता #धानुकसमाज #धानुक #Dhanuk #dhanuksamaj #धानुक_जाति ...
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लेख - १० दिनांक: १७ सितम्बर २०२६शीर्षक: "सामाजिक एकता हमारी सबसे बड़ी सामूहिक शक्ति" मैं ऐसे लेख की श्रृंखला लेकर आ रहा हूँ जो 'धानुक समाज के नाम आत्ममंथन' के नाम से होगी। पढ़ने के लिए मुझे फॉलो करें। #शशिधरकुमार #धानुकजाति #धानुकसमाज #धानुक #Dhanuk #dhanuksamaj #धानुक_जाति ...
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Sharp Edge: We now live in an India where talk of justice is momentary and transient. Arrests are no more than photo opportunities. The guilty have no fear
Politically connected goondas can openly brag about assaulting people secure in the knowledge that they will soon get bail

लेख - १०
दिनांक: १७ सितम्बर २०२६
शीर्षक: "सामाजिक एकता हमारी सबसे बड़ी सामूहिक शक्ति"
मैं ऐसे लेख की श्रृंखला लेकर आ रहा हूँ जो 'धानुक समाज के नाम आत्ममंथन' के नाम से होगी। पढ़ने के लिए मुझे फॉलो करें। #शशिधरकुमार #धानुकजाति #धानुकसमाज #धानुक #Dhanuk #dhanuksamaj #धानुक_जाति

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Ashneer Grover:
🗣️ “If I transfer ₹1 lakh to my friend through UPI, or pay ₹3,000 using a QR code, the cost of running the system is the same.

> So, if I transfer ₹1 lakh to my friend, nobody makes money from it.

But if I pay ₹2,500 to a small shopkeeper, the government

अश्नीर ग्रोवर अनुसार-पिछले 14 साल में एकमात्र उपलब्धि थी UPI

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