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Archive for the Social Issues Category

आरक्षण क्या है? आरक्षण के फायदे तथा उसके मायने।

भेदभाव और संविधान सभा
संविधान सभा में दलितों, अति-पिछड़ो और अल्पसंख्यकों के ऊपर विस्तृत चर्चा के दौरान १९५० में स्वीकार किए गए भारतीय संविधान में दुनिया के सबसे पुराने और सबसे व्यापक आरक्षण कार्यक्रम की नींव रखी गयी थी। इसके तहत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन-जातियों को शिक्षा, सरकारी नौकरियों, संसद और विधानसभाओं में आरक्षण दिया गया।

ये आरक्षण या कोटा जाति के आधार पर दिया गया था। इसे सदियों से जन्म के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव को खत्म करने के तरीक़े के तौर पर निश्चित की गई थी। यह उन लाखों दुर्भाग्यशाली लोगों के लिए एक छोटा सा हर्जाना भर था जिन्होंने अछूतपने के अपमान और नाइंसाफ़ी को हर रोज़ बर्दाश्त किया था।

अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण
यह ध्यान रहे कि 1992 तक सिर्फ अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों तक ही यह आरक्षण सीमित था, इसका मतलब साफ़ है अन्य पिछड़ा वर्ग तबतक अनारक्षित था, क्योंकि संविधान सभा में इसपर चर्चा के दौरान कई सदस्यों ने पिछड़े वर्गों को आरक्षण में रखने की सिफारिश की थी लेकिन अधिकतर सदस्यों के विरोध की वजह से इसको तत्काल सूची से हटा दिया गया था। और यह भही कहा गया था की इसको समय रहते संविधान संशोधन के द्वारा लागु कर दिया जायेगा। खासकर बिहार के कई सदस्यों ने पिछड़ो को आरक्षण नही देने की सोच को “देखते हुए अनजान बने रहने” की कोशिश तक कह डाली थी।

फिर साल १९८९ में आरक्षण पर तब राजनीति में भूचाल आ गया जब वीपी सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी २७% आरक्षण देने का फैसला किया जबकि उस समय पुरे देश में अति-पिछड़ो की संख्या तकरीबन ५०% से ऊपर की रही होगी।

उच्चतम न्यायालय का नज़रिया
सबसे अहम ये है कि उच्चतम न्यायालय ने यह मानते हुए कि ऐतिहासिक रूप से देश में जाति व्यवस्था ही नाइंसाफ़ी का प्रमुख कारण रही है, इसके बावजुद न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया कि किसी वर्ग के पिछड़ेपन का एकमात्र कारण सिर्फ जाति ना होकर अलग अलग परिस्थितियाँ भी हो सकती है जिसमें एक प्रमुख कारण जाती आधारित सदियों से हुआ शोषण है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है की जाति आधारित आरक्षण गलत है।

“पिछड़ेपन को तय” करने का आसान कारण जाति हो सकती है लेकिन उच्चतम न्यायालय ने किसी समूह को सिर्फ जाति के आधार पर पिछड़ा घोषित करने के बजाय और इसके लिए नए-नए तरीक़े तथा मानदंड तय करने के लिए सरकार को कहा ताकि कोई भी समुदाय जिसको आरक्षण की जरूरत है उसतक पहुंच सके।अदालत ने यह भी कहा कि आरक्षण का दरवाजा केवल उन्हीं के लिए खोला जाए जो सबसे अधिक पीड़ित हैं और जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

मैं कई बार लोगो के मुंह से आरक्षण के विषय में सुनता रहा हूँ आरक्षण के कारण जो योग्य है उनको नौकरी नहीं मिलती, आरक्षण गरीबी आधारित होना चाहिए, ऐसी कई भ्रांतियां समाज में फैलाई जा रही है। जबकि मैं बारंबार कहता हूँ कि इसपर विस्तृत चर्चा की आवश्यकता है।

लेकिन ऐसी भ्रांतियों को फैलाते वक़्त हमें यह नही पता की:
१) आखिर आरक्षण कहते किसे हैं?
२) इसका मकसद क्या है?
३) इसकी शुरुवात क्यों/कैसे हुई? या
४) ये था/ है किसके लिये?

लेकिन बहस हो रही है कि आरक्षण किसे दें और इसके क्या नुकसान है? लेकिन सब लोग यह मानकर बहस करने पर उतारू हैं की आरक्षण का मकसद गरीबी हटाना है, गरीबों को अमीर बनाना है……लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। जबकि सरकारें गरीबी उन्मूलन योजना अलग अलग समय मे अलग अलग नामों से गरीबी हटाने के नाम पर काम करती रही है। लोगों ने आरक्षण को गरीबी हटाने का उपाय समझ लिया है यही सारे विवादों की जड़ है जो आपकी नासमझी की वजह से पढ़े लिखे लोग या उच्च वर्ग के लोग आपकी दिमाग में एक मीठे जहर की तरह सालों से डाल रहे है। जिस आरक्षण की बात हम करते है वो सिर्फ और सिर्फ प्रतिनिधित्व (प्रतिनिधित्व की व्याख्या अलग अलग से की जा सकती है) की लड़ाई है। यह एक रास्ता है जिसमें किसी वंचित समुदाय को तमाम सामाजिक बाधाओं से बचाकर उनको सिस्टम में पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिलाने की जद्दोजहद की लड़ाई है। नौकरी देकर गरीबी हटाना इसका मकसद नहीं है। अगर योग्यता ही एकमात्र पैमाना है तो क्यो ना हम अपने देश की सारी नौकरियों में विश्व के किसी भी व्यक्ति को रख ले जो भी उस नौकरी के सर्वश्रेष्ठ योग्यता रखे उसे ही दे दे, लेकिन सरकारे ऐसा नहीं कर पाती है या नहीं कर पाएंगी। ऐसा करके हर देश अपने लोगों की उनके जीवन यापन के अधिकार को सुरक्षित रखती है, क्योंकि हर देश का संविधान यही कहता है। इसका एक उदाहरण ले सकते है कि संयुक्त राष्ट्र में भारत के साथ हर देश को अपना प्रतिनिधि रखने का अधिकार है क्योंकि यह भारत जैसे तमाम अलग अलग देशों को संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधित्व देती है। यह भी एक प्रकार का आरक्षण है। आप सोचिये अगर भारत के सदस्य की जगह पर किसी अमेरिकन या ब्रिटिश को बैठा दिया जाय तो क्या वह व्यक्ति निष्पक्ष तरीके से भारत की बात उठा पायेगा।
 
आरक्षण का वास्तविक उद्देश्य
आरक्षण का उद्देश्य ये कतई नहीं है की किसी भी समाज के हर व्यक्ति का कल्याण आरक्षण के ही माध्यम से ही होगा, बल्कि आरक्षण केवल उस वर्ग के लोगों को अलग-अलग क्षेत्रो मे प्रतिनिधित्व दिलाता है ताकि उस वर्ग के लोगों को जो भेदभाव सामाजिक रूप से झेलना पड़ता है या पड़ा है उनमे कुछ कमी आ सके और वंचित वर्ग की भी आवाज़ सुनी जा सके। इसलिए आरक्षण आबादी के अनुपात मे मिलता है।

सरकार के सामने प्रतिनिधित्व की कमी का सवाल होता है, जिसकी कमी को पूरा करने के लिए आरक्षण व्यवस्था को अमलीजामा पहनाया गया क्योंकि प्रतिनिधित्व से नौकरी और रोज़गार भी मिलता है और आर्थिक स्थिति भी मजबूत होती है, तो ज़्यादातर लोग आरक्षण को सिर्फ़ नौकरी, रोज़गार और ग़रीबी हटाने का साधन मान बैठे हैं। जो कि पूरी तरह निराधार है।सबसे कमजोर की स्थिति सुधरे यही आरक्षण का एकमात्र उद्देश्य है। सबसे कमजोर या ग़रीब कैसे उठे, उसके लिए उन्हें अलग अलग सरकारी सुविधायें आरक्षण के तहत मिली हुई है जैसे:
१) छात्रवृत्ति,
२) शिक्षण संस्थानों के साथ साथ प्रतियोगी परीक्षाओं के फीस मे छूट,
३) सरकारी शिक्षण संस्थानों में एडमिशन की शर्तों में कई प्रकार से छूट,
४) सरकारी नौकरियों में उम्र की छूट,
५) सरकारी परीक्षाओं में किये जाने वाले प्रयासों में छूट,
६) मुफ्त कोचिंग की सुविधा,
७) ज़मीन के पट्टे/निबंधन पर छूट,
८) लघु उद्योग आदि के लिए ऋण का भी प्रावधान है और भी बहुत सी सुविधाएँ हैं, जो उपर बैठे शोषक लोग खा जाते हैं या उन्हें गरीबों तक पहुचंने ही नहीं देते।

इसीलिए अगली बार जब भी आरक्षण पर चर्चा हो उसपर खुले दिमाग से पढ़कर शिक्षितों की तरह चर्चा करे, अगर पढ़े लिखे लोग इसके मर्म को समझ पाए तो अशिक्षित अपने आप ही समझने लगेंगे क्योंकि वही इसको आगे बढ़ाएंगे। हमेशा किसी भी मुद्दे को विस्तृत रूप उस समाज का मध्यम वर्ग ही देता है। इसीलिए मैं अपने समाज के लोगों से आशा करता हूँ कि खुलेमन से इस तरह के किसी भी परिचर्चा में सम्मिलित होइए और अपनी बात मजबूती के साथ रखे चाहे आप इसके खिलाफ ही क्यो ना हो। चर्चा से भागिए मत, चर्चा से ही समाज जागृत होगा।
धन्यवाद
शशि धर कुमार

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Regionalism of Dhanuk-धानुक समाज का क्षेत्रवाद

धानुक समाज के संगठनो के साथ साथ लोगो में भी क्षेत्रवाद हावी हो रहा है कुछ लोगो को यह बात नागवार गुजरी। लेकिन इसके ऊपर पुरे तथ्य है जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है।

लोगों ने क्षेत्रवाद को सिर्फ भौगोलिक दृष्टि से देखा यह भी एक सत्य है लेकिन कुछ लोगो ने इसको दूसरे तरीके से लिया। लेकिन मेरा संगठन बोलना कई लोगो को नागवार गुजरा उन्हें लगा शायद मैंने यह उनके लिए बोला है। दिक्कत यही है जो हम समझ नहीं पाते हमारे अंदर या तो समझ की कमी है या इन बातो को हम देखना नहीं चाहते है या फिर हमें व्यक्ति विशेष से परेशानी है जिसकी वजह से हम बिना वजह इन बातो पर गहराई से सोचने/विचार के बजाय बिना वजह अपने ऊपर बोली गयी बात समझ बैठते है। मान लीजिये अगर आपके ऊपर बोली भी गयी हो तो क्या आपका नाम लिया नहीं तो हमेशा आप यह सुनिश्चित नहीं हो सकते की आपके बारे में ही बात की गयी हो और यही अहं है जिसके बारे में हम सबको काम करने की आवश्यकता है हमें लगता है यह अहं नहीं है लेकिन यह है, कही ना कही आप अपने सामने किसी दूसरे को सुनना नहीं चाहते है आप यह मान बैठे है की आप जैसा सही कोई नहीं है।

मेरे क्षेत्रवाद कहने के पीछे निम्नलिखित कारण है:
१) लोग संगठनों में अपने रिश्तेदारों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाते है जिससे दूसरे क्षेत्र के अच्छे लोग वंचित हो जाते है।
२) लोग आपस में मैथिल, मगधी, अंग प्रदेश वाले, सीमांचल वाले इत्यादि कह कर एक दूसरे में विभेद पैदा कर रहे है।
३) लोग मगहिया, मैथिल इत्यादि कहकर बांटने पर लगे हुए है।
४) कुर्मी को अपना भाई कह कर धानुक में विभेद पैदा कर रहे है। धानुक कुर्मी भाई भाई है तो आज भी बिहार के कुछ इलाकों में धानुक अपने आपको धानुक नहीं कह सकते है। धानुक कुर्मी में शादी विवाह होने का मतलब यह नहीं की दोनों एक ही जाती है अगर ऐसा होता तो बिहार में सरकार दोनों जातियों को एक ही वर्ग में रखती। मैं सिर्फ तथ्य बयां कर रहा हूँ यही सत्य है।
५) धानुक के लोग आपस में भाषाई आधार पर भी बांटने पर लगे हुए है जैसे मैथिल, मगही , अंगिका वाले इत्यादि।
६) गंगा के इस पार गंगा के उस पार वाले धानुक इत्यादि।
७) आप धानुक के किस वर्ग से आते है जैसे मगहिया, चिरोट इत्यादि।
८) आप किस गोत्र से आते है अगर आप काश्यप से आते है तो आपका वर्ण अच्छा है।
९) आपके साथ ब्राह्मण बैठते है शर्तिया आप बहुत ही पढ़े लिखे होंगे या समझदार होंगे बांकी लोग या तो मुर्ख है या वे गरीब है।
१०) पूर्वी बिहार का धानुक उत्तर बिहार का धानुक मध्य बिहार का धानुक इत्यादि।
धन्यवाद
शशि धर कुमार

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Insult of Thoughts-विचारो का अपमान

हमारे बुद्धिजीवियों ने समाज की वास्तविक स्थितियो के बारे में प्रचार प्रसार ही नही किया, कुछ को छोड़कर। हमारे समुदाय में सीमित संसाधन थे, और है, लेकिन हम उन्ही सीमित संसाधनों का उपयोग भी नही कर पा रहे है।

हमें अपने पास सीमित संसाधनों से लोगों में जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है तभी हम आगे बढ़ पाएंगे। हर जाति और समुदाय अपने अपने हिसाब से उसकी समृद्धि के लिए जो भी जिसके बस में होता है वह करता है लेकिन हम या तो करना नही चाहते है या हम उस बारे में सोचना ही नही चाहते है। हर बार अगर किसी भी मुद्दे पर अपनी बात रखना चाहता है तो हम उसे रखने नही देते है अगर गलती से किसी ने रख दिया तो जो उस मुद्दे के विरोधी होते है वे उसका मानसिक वध करने पर लग जाते है। कभी कोई भी यह नही पूछता है कि आखिर इसके फायदे क्या होंगे क्या नुकसान होंगे।

हमारा समुदाय जहां तक मैंने पढ़ा है काफी प्रगतिशील विचार रखता था लेकिन आजकल हम एक ढर्रे की तरह सोचने लगे है। हमारी सांस्कृतिक पहचान अलग अलग राज्यों में अलग हो सकती है लेकिन मैं समझता हूँ कि हमारी सामाजिक पहचान एक ही है। हम सामाजिक रूप से एक है और एक ही रहेंगे। हम धानुक को धनुष का अप्रभंश तो मानने के लिए तैयार है लेकिन जिस धनुष से अप्रभंषित होकर धानुक एक ग्रुप बना और बाद में एक जाति कहलाया तथा जिसकी सबसे ज्यादा व्याख्या दिल्ली और मुग़ल सल्तनत काल में मिलती है वे तब आगरा/दिल्ली में केंद्रित था जिसके अंदर हम एक स्थानीय मिलिशिया के रूप में जाने जाते थे लेकिन उसी आगरा के धानुक से हम अलग है, अपने आपको साबित करने में लगे हुए है।

हम वास्तिवकता से भागने की कोशिश में लगे हुए है और उसी क्रम में जो अच्छा लगता है उसपर हामी तो भरते है लेकिन जैसे ही कुछ अच्छा नही लगता है वैसे ही हम उस व्यक्ति या विचार का मानसिक वध करने की कोशिश में लग जाते है। मानते है हमारे अंदर विश्वास और धैर्य की कमी है लेकिन क्या यह दो भावनाये ऐसी है जिसका संपादन नही किया जा सकता है।

मेरा मानना है की जब भी कोई विचार आता है किसी भी प्लेटफॉर्म पर उसपर चर्चा अवश्य करनी चाहिए कि क्या वह समाज के लिए सही है या नही या क्या फ़ायदे और नुकसान होने वाले है। एकदम सिरे से नकार देना बुद्धिमत्ता का परिचय तो नही देता है। लेकिन मैं कुछ सालों से देख रहा हूँ जो अपने आपको पढ़े लिखे समझदार कहते है वो झटके से विचारों को त्यागने की बात करते है कि नही हमें इसपर बात ही नही करनी है। यह दर्शाता है कि हम सामाजिक रूप से दशकों से कितने अपरिपक्व है और इस प्रकार की बाते हमारी अपरिपक्वता को बढ़ाएगी ना कि घटाएगी। जरूरी नही जो कम पढ़े लिखे है वे समझदार या अपरिपक्व नही होंगे वे समझदार भी हो सकते है और उनके अंदर परिपक्वता के साथ साथ धैर्य भी कूट कूटकर भरा होगा जो इस समाज के लिए बहुत ही जरूरी है। लेकिन हम उन्हें बुद्धिजीवियों की गिनती में नही लाते है तो वे बेचारे अपने आप को समाज के मुख्य धारा से कटा हुआ महसूस करता है।

जहाँ भी लोग मीटिंग में जाते है सिर्फ हम कुछ रटा रटाया बात ही करते है उसके समाधान की ओर नही जाते है क्यो क्योंकि हम पहले से लोगों को मुद्दे नही देते है की वे इस मुद्दे के हल के बारे में विचार करने वाले है इसलिए आप तैयारी करें और लोगो के बीच रखे।

आखिर में दो लाइन और जोड़ूँगा जिससे लोगो को तकलीफ़ तो होगी लेकिन मैं कहूँगा जरूर। वो यह कि हम विचारशील दिखना तो चाहते है, लेकिन है नही। हम बुद्धिजीवी दिखना तो चाहते है, लेकिन है नही। हम समाजसेवी दिखना तो चाहते है, लेकिन है नही। हम परिपक्व तो दिखना चाहते है, लेकिन है नही। हम दूसरों के बारे में सोचते तो है, लेकिन हम अपने बारे में सोचते है।
धन्यवाद।
शशि धर कुमार

नोट: सर्वाधिकार सुरक्षित।

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