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हूल दिवस – क्या भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का पहला अध्याय थी?

हूल दिवसइतिहास केवल राजाओं, सेनाओं और साम्राज्यों का नहीं होता; इतिहास उन लोगों का भी होता है जिनके हाथों में तलवार नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी बचाने का संकल्प होता है। हर वर्ष 30 जून को भारत के पूर्वी राज्यों—विशेषकर झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा—में हूल दिवस मनाया जाता है। यह दिन 30 जून 1855 को शुरू हुए संथाल हूल की स्मृति में समर्पित है, जब सिदो मुर्मू, कान्हू मुर्मू, चाँद मुर्मू और भैरव मुर्मू के नेतृत्व में हजारों संथालों ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन, महाजनी शोषण और जमींदारी व्यवस्था के विरुद्ध खुला विद्रोह किया।

आज जब हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा करते हैं, तो सामान्यतः 1857 के विद्रोह से शुरुआत करते हैं। लेकिन इतिहास का एक प्रश्न बार-बार सामने आता है— यदि 1855 में हजारों आदिवासी अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध हथियार उठा चुके थे, तो संथाल हूल को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का पहला अध्याय या प्रथम स्वतंत्रता संग्राम क्यों नहीं कहा जाता?

हूल का अर्थ क्या है? संथाली भाषा में “हूल” का अर्थ है—विद्रोह, क्रांति या अन्याय के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध। यह केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं थी, बल्कि सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार की घोषणा थी। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन ने राजस्व बढ़ाने के लिए नई भूमि व्यवस्थाएँ लागू कीं। जंगलों और पारंपरिक भूमि पर रहने वाले आदिवासी समुदायों का जीवन पूरी तरह बदल गया। संथाल समाज सदियों से जंगलों पर निर्भर था और आज भी है। जंगल उनके लिए केवल संसाधन नहीं थे; वे उनकी संस्कृति, आस्था, अर्थव्यवस्था और पहचान का आधार थे। लेकिन धीरे-धीरे तीन शक्तियाँ उनके जीवन पर हावी हो गईं—
अंग्रेज़ी प्रशासन
जमींदार
महाजन और साहूकार

अत्यधिक ब्याज, बेगार, भूमि हड़पना, पुलिसिया अत्याचार और प्रशासनिक पक्षपात ने संथाल समाज को अस्तित्व के संकट में धकेल दिया। यह केवल ज़मीन की लड़ाई नहीं थी। अक्सर कहा जाता है कि संथाल हूल केवल भूमि विवाद था। लेकिन यह अधूरा निष्कर्ष है। असल में यह संघर्ष तीन मूल अधिकारों का था—
जल – नदियाँ, तालाब और जलस्रोत जीवन का आधार थे।
जंगल – जंगल भोजन, औषधि, ईंधन, पशुपालन और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र थे।
ज़मीन – ज़मीन केवल संपत्ति नहीं थी; वह पहचान, सम्मान और पीढ़ियों की विरासत थी।
आज जिसे हम पर्यावरण न्याय, आदिवासी अधिकार और सामुदायिक संसाधनों पर अधिकार कहते हैं, उसकी झलक हमें 1855 के हूल में दिखाई देती है।

30 जून 1855 को वर्तमान झारखंड के भोगनाडीह गाँव में हजारों संथाल एकत्र हुए। सिदो और कान्हू ने घोषणा की कि अब अंग्रेज़ी शासन को स्वीकार नहीं किया जाएगा। इतिहासकारों के अनुसार लगभग 30,000 से 60,000 संथाल इस आंदोलन से जुड़े। विभिन्न स्रोतों में यह संख्या अलग-अलग बताई गई है, इसलिए इसे अनुमानित माना जाता है। उन्होंने स्थानीय प्रशासन, महाजनों और औपनिवेशिक तंत्र के विरुद्ध व्यापक प्रतिरोध शुरू किया। ब्रिटिश सरकार ने सैन्य बल का प्रयोग किया और कुछ ही महीनों में हजारों आदिवासी मारे गए।

क्या यह स्वतंत्रता की लड़ाई थी?
यहीं से बहस शुरू होती है। यदि स्वतंत्रता का अर्थ केवल सत्ता परिवर्तन है, तो कुछ इतिहासकार इसे स्थानीय विद्रोह मानते हैं। लेकिन यदि स्वतंत्रता का अर्थ है—
शोषण से मुक्ति,
अपनी भूमि पर अधिकार,
बाहरी शासन का विरोध,
सम्मानपूर्वक जीवन,

तो संथाल हूल निश्चित रूप से स्वतंत्रता का संघर्ष था।

फिर इसे स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा क्यों नहीं माना गया?
इस प्रश्न के कई उत्तर हैं।
1.औपनिवेशिक इतिहास लेखन
ब्रिटिश अधिकारियों ने इस संघर्ष को “Tribal Rebellion”, “Disturbance” या “Insurrection” जैसे शब्दों से दर्ज किया। वे इसे राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन स्वीकार नहीं करना चाहते थे, क्योंकि इससे औपनिवेशिक शासन की वैधता पर प्रश्न उठते।
2.इतिहास किसने लिखा?
भारत के आधुनिक इतिहास का बड़ा भाग अंग्रेज़ी स्रोतों और शिक्षित अभिजात वर्ग के दस्तावेज़ों पर आधारित रहा। आदिवासी समाज की मौखिक परंपराएँ, लोकगीत और स्थानीय इतिहास लंबे समय तक मुख्यधारा के अकादमिक विमर्श में स्थान नहीं पा सके।
3.राष्ट्रवाद की संकीर्ण परिभाषा
लंबे समय तक इतिहास में राष्ट्रवाद का अर्थ शहरी नेतृत्व, राजनीतिक संस्थाओं और अखिल भारतीय संगठनों से जोड़ा गया। जबकि आदिवासी आंदोलनों का उद्देश्य पहले अपने समाज और संसाधनों की रक्षा था।
लेकिन प्रश्न यह है— क्या स्थानीय समाज की स्वतंत्रता की लड़ाई राष्ट्रीय स्वतंत्रता की लड़ाई का हिस्सा नहीं हो सकती?
4.1857 का प्रभाव
1857 का विद्रोह सेना, राजाओं और अनेक क्षेत्रों तक फैला। बाद में इसे “भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” कहा गया। इसके कारण 1855 का संथाल हूल राष्ट्रीय विमर्श में अपेक्षाकृत पीछे चला गया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि 1857 को “प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” कहने की अवधारणा भी बाद के राष्ट्रवादी इतिहासकारों द्वारा लोकप्रिय हुई। उससे पहले ब्रिटिश इतिहासकार इसे “Sepoy Mutiny” (सिपाही विद्रोह) कहते थे। इसलिए दोनों घटनाओं की व्याख्या समय के साथ बदली है।

क्या इतिहास बदलना चाहिए?
इतिहास बदलना नहीं चाहिए, लेकिन इतिहास को पूरा अवश्य किया जाना चाहिए। आज अनेक इतिहासकार यह मानते हैं कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को केवल 1857 से शुरू करके देखना पर्याप्त नहीं है। उससे पहले भी अनेक बड़े जन-आंदोलन हुए—
संन्यासी विद्रोह
चुआड़ विद्रोह
भील विद्रोह
कोल विद्रोह
संथाल हूल

इन आंदोलनों ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध जनप्रतिरोध की परंपरा तैयार की।

भारत के आदिवासी समुदायों ने केवल अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं किया। उन्होंने यह संदेश दिया कि— “जिस समाज की आवाज़ सबसे कम सुनाई देती है, उसका संघर्ष भी राष्ट्र के निर्माण में उतना ही महत्वपूर्ण होता है।” विडंबना यह है कि जिन लोगों ने सबसे पहले अपनी धरती बचाने के लिए जान दी, वे आज भी विकास, शिक्षा और प्रतिनिधित्व की दौड़ में सबसे पीछे हैं।

आज जलवायु परिवर्तन, जंगलों का क्षरण, विस्थापन और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार जैसे प्रश्न फिर से हमारे सामने हैं। हूल हमें याद दिलाता है कि विकास और न्याय साथ-साथ चलने चाहिए। यदि विकास किसी समुदाय की पहचान मिटा दे, तो वह केवल आर्थिक प्रगति नहीं, सामाजिक असंतुलन भी पैदा करता है। हूल दिवस केवल श्रद्धांजलि देने का दिन नहीं होना चाहिए।
यह दिन होना चाहिए—
आदिवासी इतिहास को शिक्षा में उचित स्थान देने का।
स्थानीय नायकों पर शोध को बढ़ावा देने का।
मौखिक इतिहास और लोकसाहित्य का दस्तावेज़ीकरण करने का।
जल, जंगल और ज़मीन के प्रश्नों को संवैधानिक और मानवीय दृष्टि से समझने का।
भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की बहुस्तरीय और समावेशी समझ विकसित करने का।

संथाल हूल केवल 1855 की एक घटना नहीं है। यह भारत के उन करोड़ों लोगों के इतिहास का प्रतिनिधित्व करता है, जिनकी आवाज़ लंबे समय तक इतिहास की पुस्तकों में कम सुनाई दी। यह कहना कि “संथाल हूल ही भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था” इतिहासकारों के बीच सर्वसम्मत निष्कर्ष नहीं है। किंतु यह कहना भी उचित नहीं होगा कि वह केवल एक स्थानीय विद्रोह था। अधिक संतुलित दृष्टिकोण यह है कि संथाल हूल औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारत के सबसे महत्वपूर्ण प्रारम्भिक जन-आंदोलनों में से एक था, जिसने बाद के व्यापक प्रतिरोधों के लिए प्रेरणा और पृष्ठभूमि तैयार की।
शशि धर कुमार

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Dhanuk Samaj and Politicians

मैं हमेशा लिखता रहा हूँ की बिना राजनीती के हम अपने समाज के उत्थान के लिए किसी भी तरह का नीति नहीं बना सकते है और क्यों हमें अपने समाज के राजनेताओं से दूर रहना चाहिए इसके पीछे कई कारण है। हमारी जाती के लोग अपने जाति आधारित नेताओं के साथ उठने में काफी गर्व महसूस करते है। उन्हें लगता है कभी तो उनका भला हो जायेगा लेकिन ऐसा होता नहीं है बहुजन और पिछड़ों के नेताओं में इतनी ताक़त नहीं होती है की वे किसी भी बातो को बहुजनों की हितों की बातें वे खुलकर रख सके ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि उन्हें लगता है उनकी टिकट छीन जाएगी और यही वे सबसे बड़ी गलती कर जाते है। क्योंकि टिकट देने वालों को लगता है जो अपने समाज के लोगो के हितों की बातों को नहीं उठा सकता है वह हमारे लिए किसी भी विरोध में साथ कैसे खड़ा हो सकता है आपके विरोध करने की क्षमता का वहां से पता चलता है। हर बात में हमारे नेताओं की जी-हुजूरी जग जाहिर है वे अपने नेताओं के बारे में सार्वजनिक तौर पर लिखने और बोलने का प्रयास करते रहते है लेकिन उनके नेता इन्हे छोटे से छुटभैया नेता समझ कर जब जरुरत हो मंचासीन कर लेते है जब जरुरत ना हो मंच तो क्या उन्हें दूर दूर भी फटकने नहीं देते है। लेकिन इनकी मोटी बुद्धि में यह बात कभी नहीं आनी है और ना ही आएगी।

इसीलिए मैं अपने सभी युवा साथियों से आग्रह करता हूँ की वे अपना अस्तित्व ढूंढने का प्रयास करे चाहे जहाँ भी मिले वही जाइये लेकिन इज़्ज़त के साथ बोलने और सुनने वाली जगह चुनिए और मुखर होकर बोलिये जब दूसरे नेता अपने जातिहित की बात करते एक बार भी नहीं सोचते है तो आप क्यों सोचे। आप अपने समाज के वोटो को यूं ही नीलाम मत करिये सबसे कहिये अपने विवेकानुसार अपने वोट का प्रयोग करे। क्योंकि आज जिसके लिए वोट के जुगाड़ में आप खड़े है जीतते ही वे कहेंगे आप कौन क्योंकि उनके बच्चे पढ़ रहे है विदेश में और आपके बच्चों को विद्यालय भी नसीब नहीं कभी शिक्षक जनगणना कराने में व्यस्त कर दिए जाते है तो कभी बाढ़ या कोरोना के कारण विद्यालय को कैंप बना दिया जाता है कभी चुनाव में भेज दिया जाता है तो कभी गर्मी छुट्टी फिर कभी ठंढी की छुट्टी या फिर बाढ़ की छुट्टी, आपके बच्चो के भविष्य में पढ़ना नहीं लिखा हो वे ऐसा हर प्रकार से सोचने में लगे रहते है और गलती से हमारे जाति के नेता विधायक बन भी जाए तो उन्हें लगता है वे देश के सर्वोच्च स्थान पर पहुँच गए है फिर उनकी फितरत जाग जाती है पहले वे आपको सुबह शाम आपका हाल चाल जानने को फ़ोन करते थे और अब आप फ़ोन करे तो वे हमेशा व्यस्त नज़र आते है और गलती से उनके दरबार किसी से कहलवा भी भेजा की आपने याद किया है तो वे निर्लज्जता से कहते है आप कौन आपको तो पहचानते ही नहीं है। जब मंच पर खड़े होंगे तो बड़ी बड़ी बातें और लेकिन जाति के नाम पर एक काम इनसे नहीं होता है तब वह प्रोटोकॉल के खिलाफ हो जाता है और तब वे सभी जातियों और सभी धर्मो के राजनेता हो जाते है।

जब इनके पास कुछ नहीं होता है तो यही जाति के निम्न लोग उनके लिए हर संभव मदद कर इन्हें राजनीती में आगे बढाने का काम करते है अपने पॉकेट से अपने बचत के पैसे से इनके लिए प्रचार कर इन्हें आगे बढाने का हर संभव प्रयास करते है लेकिन जीतने के बाद ना तो इनके अन्दर शर्म बची होती है और ना ही हया नाम की कोई ऐसी चीज जिनके पीछे ये छिप पाये। तब ये लोग सिर्फ अपने और अपने चार परिवार के बारे में सोचते है की कैसे आगे की तीन पीढी को सही किया जाय लेकिन इन्हें यह नहीं पता होता है पैसा ऐसा चीज है जो जिस प्रकार कमाया जाता है उसी प्रकार चला जाता है भले आपके जीते जी लोग आपके मूंह पर कुछ ना बोलेन लेकिन आपके मरने के बाद आपकी बातें अवश्य होंगी की आपने विधायक या सांसद बनने से पहले और बाद में क्या और किसके साथ कैसा बर्ताव किया था और यकीन मानिए वही पूंजी है वही आपकी पहचान साबित करेगी और लोग यह भी कहने से नहीं चुकेंगे की आपने अपनी जाति की भावनाओं को सीढी बनाकार अपना और अपने परिवार की भलाई सोची तब आपकी आने वाली पीढी को यह अंदाजा अवश्य लगेगा की आपने अपने जीवन में क्या कमाया है और क्या देकर जा रहे है। पैसा बचाने के लिए भी पढ़ाई आवश्यक है यह हमेशा समझने की जरुरत है अगर आपकी अगली पीढी अपने पैसे के दम पर सोच रही है कुछ भी कर लेंगे खत्म नहीं होने वाला है तो यह दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है।

हमें ऐसे नेताओं को पहचानने की आवश्यकता है और क्यों मैं ऐसे नेताओं से दूर रहने की सलाह देता हूँ:
१) जीतने से पहले आपके साथ हमेशा संपर्क में रहते है और जीतने के बाद आपसे बात भी नहीं करते है और आपसे दुरी बना कर रखते है।
२) जीतने से पहले समाज के साथ उठना बैठना करते है बाद में वे सभी जातियों के एकमात्र सर्वमान्य नेता कहलाने लग जाते है।
३) जीतने से पहले समाज के सम्मेलनों में जाते है लेकिन जीतने के बाद वे नहीं जाते है।
४) जीतने से पहले समाज के हर शिक्षित व्यक्ति को साथ लेकर चलने की बात करते है और जीतने के बाद उन्हें नहीं पता होता है की हमारे समाज के शिक्षित लोग कहाँ कहाँ पर है।
५) जीतने से पहले समाज का आखिरी पायदान पर बैठे व्यक्ति के बीच जाने में कोई समस्या नहीं है लेकिन जीतने के बाद तो रिश्तेदारों तक से दुरी बना लेते है।
६) जीतने से पहले आपके हर व्हात्सप्प सन्देश कर उत्तर देंगे जीतने के बाद वे व्यस्त हो जाते है और उनके पास समय का आभाव हो जाता है।
७) जीतने से पहले हर ठेके पर अपने लोगो के साथ चलते है लेकिन जीतने के बाद अपने लोगो को नहीं देकर दूसरों को देते है क्यों बांकी आप समझदार है।
८) जीतने से पहले उन्हें शिक्षा, बेरोजगारी और समाज में फैले कुव्यवस्था के ऊपर बोलना क्रांतिकारी लगता है लेकिन जीतने के बाद यह अपने नेताओं के खिलाफ जाना लगता है।
९) जीतने से पहले आरक्षण व्यवस्था से जाति की समाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार संभव है लेकिन जीतने के बाद इसपर बोलना उनके पार्टी लाइन के खिलाफ होगा।
१०) जीतने से पहले समाज की हर समस्या उनकी समस्या है लेकिन जीतने के बाद समाज के हर व्यक्ति की समस्या उनकी अपनी नहीं हो सकती है।

आप उपरोक्त सभी बातों पर अपने नेताओं को परखिये फिर बताइए की क्या आपका नेता उपरोक्त बातों पर खड़ा उतरता है या कही ना कही वे भी इसी दस मुख्य बिन्दुओं पर अटक जा रहे है तो आपको सोचने की आवश्यकता है। आज आपका लगता होगा अगली बार इसे नहीं जिताएंगे और अगर उनका अपनी पार्टी से पत्ता साफ़ भी हो गया तो वे दूसरी पार्टी में जाकर अपने लिए टिकट हासिल कर लेंगे क्योंकि सब कुछ पैसे का खेल हो गया है और आपके पास आयेंगे और रोना रोयेंगे की पहली बार जीतने की वजह से उन्हें कुछ भी पता नहीं चला इस बार जिताइये समाज का पूरा भला करेंगे और फिर आप इनके चापलूसी भरी बातों में आकर इनको वोट देकर भेज देंगे और फिर वही होगा जो पहले से होता आया है और यही पिछले ७५ सालों में हुआ है आपके साथ सिर्फ और सिर्फ छलावा और आगे भी होता रहेगा बेह्तर है जितना जल्दी संभलेंगे उतना जल्दी समाज का भला हो पायेगा।
धन्यवाद!
शशि धर कुमार
नोट: सर्वाधिकार सुरक्षित।

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Who is responsible – जिम्मेदार कौन?

हमारे धानुक समाज के संगठन पटना, नालंदा और मिथिला के अलावा किसी और जिले के बारे में नहीं सोच पा रहे है। आजकल इसी क्षेत्र में कुछ ज्यादा ही तितलियों के उड़ने की ख़बरें आ रही है जो दो काम करती है एक तो हवा में ध्वनि प्रदुषण और दुसरा फसलों का सत्यानाश और अपने समाज के लोग भी वही करने में लगे हुए है वे समाज की भलाई के लिए क्या कदम उठने चाहिए वे तो सोच नहीं पाते साथ में सामाजिक ताने बाने को छिन्न भिन्न अवश्य कर रहे है। कोई कहता है हम राजनैतिक संगठन में नहीं है लेकिन उनके लोग लगातार राजनैतिक प्लेटफार्म पर नज़र आते रहते है उनके फेसबुक टाइमलाइन को देखिये तो पता चलता है वे सिर्फ विद्वेष फैलाने के काम में लगे हुए है चाहे वो धार्मिक हो या जातिगत कही से जातिगत भलाई या उनके वास्तविक उत्थान की बात नहीं हो पा रही है। समाज के जो पढ़े लिखे लोग है उन्हें यह तक नहीं पता है की बिहार के किस जिले में किस प्रखंड में कितनी संख्या में समाज के लोग है या किस किस विधानसभा में हम खेल अपने पाले में लाने का माद्दा रखते है। हर जिले में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक समस्या का स्तर अलग अलग है जो हमारे तथाकथित कर्त्ता-धर्ता इन बातों को समझने में नाकाम रहे है और आप इसको ऐसे समझ सकते है की वे इसका बौद्धिक सर्वेक्षण तक नहीं करवा पाए जमीनी सर्वेक्षण तो दूर की बात है किन्ही से पूछिए तो कहेंगे की हमारी संख्या इतनी लाख है हम किसी को भी हिलाने का दम रखते है लेकिन जब उनसे पूछिए की किस जिले में कितने धानुक होंगे तो बोलती बंद, सवाल है क्यों नहीं १९३१ के जनगणना के अनुसार ही अनुमानित प्रोजेक्शन के आधार अपनी जनसंख्या कितनी हो उसके बारे में सोचा जाय, क्यों नहीं जिलावार इसके बारे में प्रोजेक्शन के आधार संख्या पता की जाय, लेकिन समस्या है की हमारे नेतागण को इन बातों से कोई मतलब नहीं है।

सभी लोग अभी भी सिर्फ मगध और मिथिला में फोकस किये हुए है जो धानुक की एक बड़ी संख्या कोशी क्षेत्र में है उनके बारे में आज तक कोई धानुक संगठन और ना ही कोई नेता बात कर पाया। कुछ लोग अच्छे पढ़े लिखे है उन्हें पता भी है इसका उपयोग कैसे किया जा सकता है लेकिन वे भी नाकाम लग रहे है।

हमारे समाज के लोग जय हो, जय हो, करने में लगे रहते है लेकिन जो संवेदनशील होकर लिखते है उनके बारे में ना तो समाज का कोई नेता बात करना चाहता है ना ही किसी साहित्यिक व्यक्ति की सुधि लेना चाहता है। बस हर व्यक्ति को या तो MLA बनना है या MP बनना। इससे समाज में धरातल पर आमूल चूल परिवर्तन संभव नही है, ना ही किसी नेता के पास कोई खाका नज़र आता है कि वे समाज में शिक्षा को लेकर जो अदूरदर्शिता है उसके बारे में क्या सोच रहा है और नेताओं को तो वैसे भी सोचना नही है। धानुक का जातीय संगठन इतना है कि हर किसी संगठन को कोई ना कोई नेता अपने पॉकेट में लेकर घूम रहा होता है। संगठन के काम को लेकर इतनी अदूरदर्शिता है की कोई भविष्य नही देख रहा है, ना नौकरी बची है ना ही आरक्षण क्योंकि आरक्षण को निजीकरण ने इस तरह अपने अदंर समाहित किया हुआ है कि उसका वजूद ही खत्म नज़र आ रहा है। हर जगह ओबीसी को NFS (नॉट फाउंड सूटेबल) के नाम पर नौकरी नही दी जा रही है। ओबीसी से ज्यादा सीट किसी भी वैकेंसी में EWS की होती है उसपर किसी की कोई नज़र नही है।

लेकिन हमारे नेताओं को बस जिसकी जितनी संख्या उतनी भागीदारी पर सिर्फ MP या MLA बनने की चिंता है। इससे समाज की वास्तविक भलाई तो मुश्किल है साथ में ऐसे नेता अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित तो कर ले रहे है लेकिन समाज के बच्चों का ना तो वर्तमान सुरक्षित है ना ही भविष्य सभी नेताओं की अपनी अपनी बात है की कैसे वे, ये जो वोट है उसको सुरक्षित किया जाय और उसी की जद्दोजहद है यह पूरी की पूरी कवायद। हमारे बच्चें तो पढ़ने से इतना दूर भागते है की उन्हें लगता है इन नेताओं के आगे पीछे करने से उनका या उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। ऐसा नहीं, मैं सभी बच्चो से अपील करता हूँ वे इस पुरे खेल को समझे और आप कहाँ और किस भंवर जाल में फंस रहे है आपको पता नहीं चल रहा है आपके लिए सिर्फ और सिर्फ आपके पडोसी स्वजातीय भाई ही खड़ा हो सकता है और कोई नहीं। आपको कोई भी नेता ना तो यह बताएगा की वैकेंसी क्यों नहीं निकल रही है ना ही यह बताएगा की ओबीसी की वैकेंसी NFS (नॉट फाउंड सूटेबल) के नाम पर कहाँ जा रहा है और ना ही वे यह बताएंगे ओबीसी से ज्यादा सीट किसी भी वैकेंसी में EWS की क्यों होती है। इसमें भी दो बातें है एक तो उन्हें खुद नहीं पता और अगर पता भी हो तो वे नहीं बताएंगे क्योंकि इससे उनकी राजनीती पर असर पड़ेगा।
धन्यवाद।
शशि धर कुमार
नोट: सर्वाधिकार सुरक्षित।

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