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Freedom Fighters from Backwards-पिछड़ों के शहीद

गुलशन की जरूरत पड़ी, तो लहू हमनें भी दिया।
जब चमन में बहार आयी तो कहते है तुम्हारा काम नहीं।
इतिहास हमसे ही लिखाया और,
जब पन्ना पलटा तो हमारा नाम नहीं।।
शहीद रामफल मंडल

शहीदों के श्रृद्धांजलि यात्रा कार्यक्रम के तहत बिहार सरकार की परिवहन मंत्री माननीया श्रीमती शीला मंडल जी दिनांक 29 नवंबर 2020 को कर्पूरी ठाकुर संग्रहालय, पटना से यात्रा प्रारंभ कर जननायक के जन्मभूमि समस्तीपुर के कर्पूरी ग्राम, पितौझिया में जननायक कर्पूरी ठाकुर के प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की। उसके बाद आजादी की लड़ाई में फांसी को गले लगाने वाले मुजफ्फरपुर के अमर शहीद जुब्बा साहनी एवं 1942 के स्वंतन्त्रता आंदोलन में तिलक मैदान मुजफ्फरपुर में तिरंगा फहराने के क्रम में पुलिस की गोली से शहीद भगवान लाल चन्द्रवंशी के प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की।

इसके बाद बिहार के सीतामढ़ी के बाजपट्टी में आजादी की लड़ाई में 19वर्ष की उम्र में फांसी को गले लगाने वाले अखंड बिहार का पहले अमर शहीद रामफल मंडल जी के आदमकद प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। शहीद रामफल मंडल टावर पर ही सीतामढ़ी जिले में 1942 में अंग्रेजी पुलिस की गोली से बाजपट्टी, बनगांव के शहीद जानकी सिंह एवं प्रदीप सिंह, रीगा के अमर शहीद मथुरा मंडल, ननू मियां एवं सुन्दर महरा तथा सुरसंड के अमर शहीद सुन्दर खतवे एवं राम-लखन गुप्ता, चोरौत के शहीद भदई कबारी और बेलसंड के तरियानी, छपरा के अमर शहीद भूपन सिंह, नौजाद सिंह, सुखदेव सिंह, वंशी ततमा, सुखन लोहार, गुगुल धोबी, परसत तेली, छठू कानू, बलदेव सुढी, बिकन कुर्मी, बंगाली नूनिया, बुधन कहार, बुझावन चमार सहित पुलकित कामत आदि लोगों ने अपनी जान देकर आजादी के आंदोलन में अपना सर्वश्व तक न्यौछावर कर दिया। उन्होंने इसी यात्रा कार्यक्रम को जारी रखते हुए पुपरी शहीद टावर पर पुपरी के अमर शहीद महावीर गोप, गंभीरा राय, रामबुझावन ठाकुर, सहदेव साह आदि को श्रृद्धांजलि अर्पित की।

अमर शहीद रामफल मंडलइसके बाद शहीद रामफल मंडल जी के जन्म भूमि बाजपट्टी के मधुरापुर मंडल टोल में शहीद रामफल मंडल के परिजन अमीरी लाल मंडल के घर के आंगन में पहुंच कर मिट्टी को अपने ललाट पर लगाते हुए अमीरी लाल मंडल के खपरैल और फूस का जीर्ण शीर्ण मकान, गरीबी, बेवसी और लाचारी देखकर भाव विभोर हो गई। एक भावनात्मक व्यक्ति के लिए यह एक स्वाभाविक बात होती है जिसकी वजह से उनकी आंख में आंसू आ गए क्योंकि वे भी उन्ही लोगों में से एक है और आजादी के महत्व को भली भांति समझती भी है साथ में एक कवियित्री भी है। जिन उद्देश्यों के लिए शहीद रामफल मंडल 23 अगस्त 1943 ई को भागलपुर सेन्ट्रल जेल में फांसी को गले लगा लिए और आज आजादी के इतने वर्षों बाद भी उनकेे परिजन इस स्थिति में देखकर भावनात्मक रूप से बह जाना एक संवेदनशील व्यक्ति की निशानी है। शहीद रामफल मंडल के आंगन से मंत्री शीला मंडल जी ने जो बयान दिया, उसपर कुछ लोगों में आक्रोश है। मंत्री शीला मंडल के कहने का तात्पर्य यह था कि जिस तरह 1857 ई. के महान स्वतंत्रता सेनानी शाहाबाद के राजा बाबू वीर कुंवर सिंह राजपूत जाति से थे। जो राजा भी थे। गंगा नदी पार करते समय अंग्रेजी पुलिस की गोली उनके बांह में लगी और जहर फैलने से रोकने के लिए जख्मी बांह को स्वयं ही काट डाला।

उदाहरण स्वरुप उन्होंने कहा कि जिस तरह वीर कुंवर सिंह का बांह कट गया तो इतिहास के पन्नों में बच्चा बच्चा को पढ़ाया जाता है, उसी तरह आजादी की लड़ाई में फांसी को गले लगाने वाले अमर शहीद रामफल मंडल, जुब्बा साहनी सहित जो जाति धर्म के कमज़ोर, वंचित एवं गरीब परिवारों से आनेवाले शहीदों को इतिहास में जगह नहीं मिली। इतिहासकारों द्वारा कमजोर वर्ग के शहीदों के साथ नाइंसाफी तो किया इसमें कोई संदेह नही। अगर शहीद रामफल मंडल जी भी वीर कुंवर सिंह की तरह उच्च वर्ग तथा बड़े परिवार से होते तो शायद इतिहास में उनको भी जगह मिलती। पाठ्य पुस्तकों में जीवनी शामिल होती। नीतीश कुमार जी के शासनकाल में ही 2006 ई में शहीद रामफल मंडल की प्रतिमा बाजपट्टी में लगायी गई, जिसका अनावरण नीतीश कुमार जी ने किया। शहीद रामफल मंडल पर डाक टिकट जारी करने का प्रक्रिया चल रही है जिसके लिए आधिकारिक तौर पर समाज की तरफ से माँग भी रखी गयी है।

सोशल मीडिया पर मंत्री शीला मंडल के बयान पर खास वर्ग के लोग आक्रोशित हैं। मंत्री शीला मंडल ने विभिन्न चैनलों पर दिये गये बयान पर कहा कि उनकी मंशा किसी की भावना को ठेस पहुंचाने की नहीं थी। अगर मेरे बयान से किसी की भावना आहत हुई हैं, तो खेद व्यक्त करती हूँ। इसके बावजूद कुछ लोग इसे अपने स्वाभिमान से जोड़ कर देखने की कोशिश कर रहे है जो अगर इसे सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखे तो सही नही है। स्वाभिमान गरीबों, वंचितों एवं कमज़ोर वर्गों में भी होता है।

जिस दिन शहीद रामफल मंडल, जुब्बा साहनी, वंशी ततमा, गुगुल धोबी, भदई कबारी, सुखन लोहार, परसत तेली, छठू कानू, बलदेव सुढी, सुन्दर खतवे, राम-लखन गुप्ता, सुन्दर महरा, भूपन सिंह, नौजाद सिंह, बिकन कुर्मी, बंगाली नूनिया, बुधन कहार, बुझावन चमार, रामानंदन पासवान सहित अन्य शहीदों के बिहार में पहली बार श्रृद्धांजलि यात्रा के माध्यम से सम्मान देने वाली परिवहन मंत्री माननीया श्रीमती शीला मंडल जी ने किसी भी वर्ग की भावनाओं को कोई ठेस नही पहुँचाया है उन्होंने सिर्फ उदाहरण के तौर पर इसका उल्लेख किया था। और उनके समर्थन में पूरा वंचित तबका उनके साथ खड़ा है चाहे वो बिहार में रहते हो या बिहार के बाहर रहने वाले बिहारी हो।

वैसे भी 1857 ई के विद्रोह को विभिन्न इतिहासकारों ने इसे अलग अलग तरीके से बताने की कोशिश की किसी ने इसे सिपाही विद्रोह कहा तो किसी ने इसे राजा और जमींदारों का विद्रोह, तो किसी ने इसे धार्मिक विद्रोह तो किसी ने सांस्कृतिक विद्रोह कहा है। तो जब 1857 का विद्रोह के लिए हमारे देश के इतिहासकार एकमत नही है तो फिर संभव है ऐसे ही कई और बातों की परतें जब इतिहास के पन्नो से खंगाला जाएगा तो उसमें से अमर शहीद रामफल मंडल जैसे लोग निकलेंगे जिनके बारे में बिहार को जानकारी नही। और इसमें कोई दो राय नही जब हम खुद खंगालने लगे तो 1942 के आंदोलन से ही कई ऐसे पन्ने निकले जो अभी तक दफ़न रहे है किसी ना किसी वजह से। बात सिर्फ इतनी है कि अगर शहीद हुए तो सभी को समान शहीद का दर्जा मिले।

कहा जाता है अगर 1857 का विद्रोह आम भारतीय के लिए आंदोलन होता तो सफलता मिल गयी होती। लेकिन जो लोग आज वीर कुंवर सिंह जी का नाम लेने पर आक्रोशित हो रहे है उन्ही में से सीतामढ़ी के अमर शहीद जानकी सिंह, प्रदीप सिंह, भुपन सिंह, सुखदेव सिंह, नौजाद सिंह जैसे कमजोर गरीब शहीदों को उनके अपने लोग लोग क्यों भूल गए, क्या वे शहीद नही हुए थे। क्योंकि आमजन को यह बातें पता ही नही है अगर पता नही है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है इस बात को समझने की आवश्यकता है। माननीया परिवहन मंत्री श्रीमती शीला मंडल जी ने उन गुमनाम शहीदो को भी श्रृद्धांजलि अर्पित की है। जिनके परिवारजन अभी तक इस बात को तरस रहे थे कि उनके शहीद को तो कोई सरकारी व्यक्ति याद करें उन्हें भी वही सम्मान मिले जो बाँकी शहीदों को दिया जाता है। और यह यात्रा कार्यक्रम इसी कड़ी में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है क्योंकि वे उन सभी को याद करने की कोशिश में जिनको इतिहास के पन्नो में या तो गुम कर दिया गया या तो भुला दिया गया।

दरअसल श्रीमती शीला मंडल जी की भावना को समझने की जरूरत है वे रामफल मंडल की वंशज हैं। पहली बार विधायक और मंत्री बनने के बाद अपने घर जाने से पहले शहीद रामफल मंडल एवं अन्य महापुरुषों के जन्मभूमि की मिट्टी को माथे पर तिलक लगाते हुए जानें का कार्यक्रम था। जिसके तहत् शहीद रामफल मंडल जी के परिजन के घर की दुर्दशा को देखकर दुखी हो गयी। इसी क्रम में उन्होंने वीर कुंवर सिंह का उदाहरण देते हुए शहीद रामफल मंडल को भी उसी तरह का सम्मान नहीं मिलने पर बयान दिया। उनका बयान एक संदर्भित था जिससे लोग इस बात को आसानी से समझ सके।

शहीदों की कोई जाति नहीं होती है। शहीद देश का होता है। लेकिन कलम के धनी इतिहासकारों ने इतिहास के साथ छल ही नही किया है वरन उसे छुपाने का एक जघन्य अपराध किया है। इससे कमजोर वर्गों में गुस्सा आना स्वाभाविक है और मंत्री महोदया का बयान इसी कड़ी में दिया गया एक बयान था।

ज़रुरत है आजादी के आंदोलन के सभी अमर शहीदों की जीवनी एवं उसके बारे में नयी पीढ़ी को बताया जाए जिससे किसी भी जाति समुदाय में इस तरह का विद्वेष पैदा ना हो पाए।

अंत में संविधान निर्माता डॉ अम्बेडकर साहेब एक पंक्ति याद दिलाना चाहूँगा कि “जो देश एवं समाज अपने इतिहास को भूल जाता है, इतिहास उसे भूला देता है।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शहीद हुए सभी अमर शहीदों कोटि कोटि नमन और विनम्र श्रद्धांजलि।

Social Consciousness-सामाजिक चेतना

आर्थिक,सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, धार्मिक,राष्ट्रीय तथा समाज में प्रचलित परम्परागत मूल्यों के परस्पर संवाद से जो आया बोध जागृत होता है उसकी समाज और विश्लेषणात्मक शक्ति का नाम सामाजिक चेतना हो सकता है। सामाजिक चेतना केवा समझ ही नहीं देती बल्कि वह सामाजिक उदेश्यों को पूरा करने के लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देती है। हमारा कुंठा से ग्रस्त जीवन में आशा रौशनी व् विश्वास जागृत करके उन्हें एक सूत्र में पिरोना ही सामाजिक चेतना का कार्य है।

यदि व्यक्ति अपने इन्द्रियों पर नियंत्रण कर ले तो सामाजिक विसंगतियां स्वत: ही दूर हो जाएंगी। वास्तव में विसंगतियों की जननी मनुष्य की कामनाएं होती है। ऐसे में शिक्षा के प्रकाश से ऐसी कामनाओं पर विराम लगता है और व्यक्ति समाज व देश हित में सोचता है, इसलिए व्यक्ति के निर्माण में शिक्षा की अहम भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता।  हर युग में समाज व राष्ट्रनिर्माण में शिक्षा की महत्ता रही है। प्राचीन काल में विद्वानों को उच्च स्थान प्राप्त था और सभी उन्हें सम्मान देते थे। वर्तमान व्यवस्था भी उससे इतर नहीं है। शिक्षित व योग्य व्यक्ति को समाज में उच्च स्थान प्राप्त है।

समाज को सही पथ पर आगे बढ़ाने के लिए दो बातों का होना अत्यंत जरूरी है- एक महान आदर्श और एक महान व्यक्तित्व। सामाजिक चेतना का बीज एक साथ चलने और चिंतन करने में है। जहां ऐसे मंत्र नहीं हैं, वहां कोई आदर्श नहीं है और जहां कोई आदर्श नहीं है, वहां जीवन लक्ष्यविहीन है। मनुष्य की अभिव्यक्तियां और चलने की राह भी अनेक है। कुल मिलाकर, मनुष्य की विभिन्न अभिव्यक्तियां ही संस्कृति है। एक समूह के व्यक्ति के साथ दूसरे समूह के व्यक्ति की अभिव्यक्ति के तरीके में भिन्नता हो सकती है। जैसे एक समूह के व्यक्ति अपने हाथों से खाते हैं, तो दूसरे समूह के व्यक्ति चम्मच से खाते हैं, किंतु सबकी संस्कृति एक ही है। इसलिए मानव समाज की संस्कृति एक और अविभाज्य है। बौद्धिक विकास के साथ मनुष्य की अभिव्यक्तियों में वृद्धि की संभावना है।

समाज के आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व राजनीतिक कलेवर होते हैं। इस कारण उनमें अनेक विसंगतियां भी दृष्टिगत होती हैं। विसंगतिया पैदा करने वाले तत्व सदैव यही प्रयास करते हैं कि उन्हें कायम रखा जाए, लेकिन शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जो सामाजिक विसंगतियों व समस्याओं को दूर कर सकता है। साथ ही मनुष्य में सामाजिक चेतना जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। शिक्षित समाज में ही कला, संस्कृति व साहित्य के उत्थान के अवसर तलाशे जा सकते हैं। शिक्षित समाज से ही प्रशासनिक, राजनैतिक व आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

आरक्षण क्या है? आरक्षण के फायदे तथा उसके मायने।

भेदभाव और संविधान सभा
संविधान सभा में दलितों, अति-पिछड़ो और अल्पसंख्यकों के ऊपर विस्तृत चर्चा के दौरान १९५० में स्वीकार किए गए भारतीय संविधान में दुनिया के सबसे पुराने और सबसे व्यापक आरक्षण कार्यक्रम की नींव रखी गयी थी। इसके तहत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन-जातियों को शिक्षा, सरकारी नौकरियों, संसद और विधानसभाओं में आरक्षण दिया गया।

ये आरक्षण या कोटा जाति के आधार पर दिया गया था। इसे सदियों से जन्म के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव को खत्म करने के तरीक़े के तौर पर निश्चित की गई थी। यह उन लाखों दुर्भाग्यशाली लोगों के लिए एक छोटा सा हर्जाना भर था जिन्होंने अछूतपने के अपमान और नाइंसाफ़ी को हर रोज़ बर्दाश्त किया था।

अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण
यह ध्यान रहे कि 1992 तक सिर्फ अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों तक ही यह आरक्षण सीमित था, इसका मतलब साफ़ है अन्य पिछड़ा वर्ग तबतक अनारक्षित था, क्योंकि संविधान सभा में इसपर चर्चा के दौरान कई सदस्यों ने पिछड़े वर्गों को आरक्षण में रखने की सिफारिश की थी लेकिन अधिकतर सदस्यों के विरोध की वजह से इसको तत्काल सूची से हटा दिया गया था। और यह भही कहा गया था की इसको समय रहते संविधान संशोधन के द्वारा लागु कर दिया जायेगा। खासकर बिहार के कई सदस्यों ने पिछड़ो को आरक्षण नही देने की सोच को “देखते हुए अनजान बने रहने” की कोशिश तक कह डाली थी।

फिर साल १९८९ में आरक्षण पर तब राजनीति में भूचाल आ गया जब वीपी सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी २७% आरक्षण देने का फैसला किया जबकि उस समय पुरे देश में अति-पिछड़ो की संख्या तकरीबन ५०% से ऊपर की रही होगी।

उच्चतम न्यायालय का नज़रिया
सबसे अहम ये है कि उच्चतम न्यायालय ने यह मानते हुए कि ऐतिहासिक रूप से देश में जाति व्यवस्था ही नाइंसाफ़ी का प्रमुख कारण रही है, इसके बावजुद न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया कि किसी वर्ग के पिछड़ेपन का एकमात्र कारण सिर्फ जाति ना होकर अलग अलग परिस्थितियाँ भी हो सकती है जिसमें एक प्रमुख कारण जाती आधारित सदियों से हुआ शोषण है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है की जाति आधारित आरक्षण गलत है।

“पिछड़ेपन को तय” करने का आसान कारण जाति हो सकती है लेकिन उच्चतम न्यायालय ने किसी समूह को सिर्फ जाति के आधार पर पिछड़ा घोषित करने के बजाय और इसके लिए नए-नए तरीक़े तथा मानदंड तय करने के लिए सरकार को कहा ताकि कोई भी समुदाय जिसको आरक्षण की जरूरत है उसतक पहुंच सके।अदालत ने यह भी कहा कि आरक्षण का दरवाजा केवल उन्हीं के लिए खोला जाए जो सबसे अधिक पीड़ित हैं और जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

मैं कई बार लोगो के मुंह से आरक्षण के विषय में सुनता रहा हूँ आरक्षण के कारण जो योग्य है उनको नौकरी नहीं मिलती, आरक्षण गरीबी आधारित होना चाहिए, ऐसी कई भ्रांतियां समाज में फैलाई जा रही है। जबकि मैं बारंबार कहता हूँ कि इसपर विस्तृत चर्चा की आवश्यकता है।

लेकिन ऐसी भ्रांतियों को फैलाते वक़्त हमें यह नही पता की:
१) आखिर आरक्षण कहते किसे हैं?
२) इसका मकसद क्या है?
३) इसकी शुरुवात क्यों/कैसे हुई? या
४) ये था/ है किसके लिये?

लेकिन बहस हो रही है कि आरक्षण किसे दें और इसके क्या नुकसान है? लेकिन सब लोग यह मानकर बहस करने पर उतारू हैं की आरक्षण का मकसद गरीबी हटाना है, गरीबों को अमीर बनाना है……लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। जबकि सरकारें गरीबी उन्मूलन योजना अलग अलग समय मे अलग अलग नामों से गरीबी हटाने के नाम पर काम करती रही है। लोगों ने आरक्षण को गरीबी हटाने का उपाय समझ लिया है यही सारे विवादों की जड़ है जो आपकी नासमझी की वजह से पढ़े लिखे लोग या उच्च वर्ग के लोग आपकी दिमाग में एक मीठे जहर की तरह सालों से डाल रहे है। जिस आरक्षण की बात हम करते है वो सिर्फ और सिर्फ प्रतिनिधित्व (प्रतिनिधित्व की व्याख्या अलग अलग से की जा सकती है) की लड़ाई है। यह एक रास्ता है जिसमें किसी वंचित समुदाय को तमाम सामाजिक बाधाओं से बचाकर उनको सिस्टम में पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिलाने की जद्दोजहद की लड़ाई है। नौकरी देकर गरीबी हटाना इसका मकसद नहीं है। अगर योग्यता ही एकमात्र पैमाना है तो क्यो ना हम अपने देश की सारी नौकरियों में विश्व के किसी भी व्यक्ति को रख ले जो भी उस नौकरी के सर्वश्रेष्ठ योग्यता रखे उसे ही दे दे, लेकिन सरकारे ऐसा नहीं कर पाती है या नहीं कर पाएंगी। ऐसा करके हर देश अपने लोगों की उनके जीवन यापन के अधिकार को सुरक्षित रखती है, क्योंकि हर देश का संविधान यही कहता है। इसका एक उदाहरण ले सकते है कि संयुक्त राष्ट्र में भारत के साथ हर देश को अपना प्रतिनिधि रखने का अधिकार है क्योंकि यह भारत जैसे तमाम अलग अलग देशों को संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधित्व देती है। यह भी एक प्रकार का आरक्षण है। आप सोचिये अगर भारत के सदस्य की जगह पर किसी अमेरिकन या ब्रिटिश को बैठा दिया जाय तो क्या वह व्यक्ति निष्पक्ष तरीके से भारत की बात उठा पायेगा।
 
आरक्षण का वास्तविक उद्देश्य
आरक्षण का उद्देश्य ये कतई नहीं है की किसी भी समाज के हर व्यक्ति का कल्याण आरक्षण के ही माध्यम से ही होगा, बल्कि आरक्षण केवल उस वर्ग के लोगों को अलग-अलग क्षेत्रो मे प्रतिनिधित्व दिलाता है ताकि उस वर्ग के लोगों को जो भेदभाव सामाजिक रूप से झेलना पड़ता है या पड़ा है उनमे कुछ कमी आ सके और वंचित वर्ग की भी आवाज़ सुनी जा सके। इसलिए आरक्षण आबादी के अनुपात मे मिलता है।

सरकार के सामने प्रतिनिधित्व की कमी का सवाल होता है, जिसकी कमी को पूरा करने के लिए आरक्षण व्यवस्था को अमलीजामा पहनाया गया क्योंकि प्रतिनिधित्व से नौकरी और रोज़गार भी मिलता है और आर्थिक स्थिति भी मजबूत होती है, तो ज़्यादातर लोग आरक्षण को सिर्फ़ नौकरी, रोज़गार और ग़रीबी हटाने का साधन मान बैठे हैं। जो कि पूरी तरह निराधार है।सबसे कमजोर की स्थिति सुधरे यही आरक्षण का एकमात्र उद्देश्य है। सबसे कमजोर या ग़रीब कैसे उठे, उसके लिए उन्हें अलग अलग सरकारी सुविधायें आरक्षण के तहत मिली हुई है जैसे:
१) छात्रवृत्ति,
२) शिक्षण संस्थानों के साथ साथ प्रतियोगी परीक्षाओं के फीस मे छूट,
३) सरकारी शिक्षण संस्थानों में एडमिशन की शर्तों में कई प्रकार से छूट,
४) सरकारी नौकरियों में उम्र की छूट,
५) सरकारी परीक्षाओं में किये जाने वाले प्रयासों में छूट,
६) मुफ्त कोचिंग की सुविधा,
७) ज़मीन के पट्टे/निबंधन पर छूट,
८) लघु उद्योग आदि के लिए ऋण का भी प्रावधान है और भी बहुत सी सुविधाएँ हैं, जो उपर बैठे शोषक लोग खा जाते हैं या उन्हें गरीबों तक पहुचंने ही नहीं देते।

इसीलिए अगली बार जब भी आरक्षण पर चर्चा हो उसपर खुले दिमाग से पढ़कर शिक्षितों की तरह चर्चा करे, अगर पढ़े लिखे लोग इसके मर्म को समझ पाए तो अशिक्षित अपने आप ही समझने लगेंगे क्योंकि वही इसको आगे बढ़ाएंगे। हमेशा किसी भी मुद्दे को विस्तृत रूप उस समाज का मध्यम वर्ग ही देता है। इसीलिए मैं अपने समाज के लोगों से आशा करता हूँ कि खुलेमन से इस तरह के किसी भी परिचर्चा में सम्मिलित होइए और अपनी बात मजबूती के साथ रखे चाहे आप इसके खिलाफ ही क्यो ना हो। चर्चा से भागिए मत, चर्चा से ही समाज जागृत होगा।
धन्यवाद
शशि धर कुमार

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