धनुर्धर जाति

Archive for the Social Issues Category

पढ़ना शुरू कीजिए: अपनी सोच की चाबी किसी और के हाथ में मत दीजिए | धानुक जाति

हूल दिवसआज हमारे पास जानकारी की कमी नहीं है। मोबाइल फोन खोलते ही दुनिया हमारे सामने होती है। WhatsApp, Facebook, YouTube और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हर मिनट हजारों संदेश, वीडियो और पोस्ट हमारे सामने आते हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल हमें स्वयं से पूछना चाहिए— क्या हम वास्तव में पढ़ रहे हैं, या सिर्फ सूचनाओं को स्क्रॉल कर रहे हैं? क्योंकि इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। पढ़ना हमें सोचने की क्षमता देता है, जबकि लगातार बिना जाँचे सामग्री देखना कई बार हमारी सोच को दूसरों के बनाए हुए निष्कर्षों पर निर्भर कर सकता है।

जब Forward हमारी सोचने लगे, WhatsApp पर कोई संदेश आता है।
किसी महापुरुष के नाम से कोई कथित उद्धरण होता है।
किसी ऐतिहासिक घटना के बारे में कोई दावा होता है।
किसी सरकारी योजना या कानून के बारे में कोई जानकारी होती है।
किसी जाति, समुदाय या व्यक्ति के बारे में कोई टिप्पणी होती है।
हम उसे पढ़ते हैं और कई बार बिना स्रोत देखे आगे भेज देते हैं। फिर वही संदेश दूसरे समूह में जाता है। वहाँ से तीसरे में। फिर चौथे में। कुछ समय बाद वही बात हमें इतनी बार दिखाई देती है कि हमें लगता है—
“यह तो सच ही होगा, इतने लोग भेज रहे हैं!”
लेकिन किसी बात को बार-बार भेजे जाने से वह सत्य नहीं हो जाती। सत्य के लिए स्रोत, प्रमाण और संदर्भ जरूरी हैं। यही कारण है कि हमें पढ़ने की आदत विकसित करनी होगी।

पढ़ना केवल परीक्षा के लिए नहीं है, हमारे समाज में पढ़ाई को अक्सर नौकरी और परीक्षा से जोड़कर देखा जाता है। निश्चित रूप से शिक्षा और रोजगार के लिए पढ़ना जरूरी है। लेकिन पढ़ने का महत्व इससे कहीं बड़ा है। पढ़ना हमें बेहतर नागरिक, बेहतर अभिभावक और अधिक जागरूक इंसान बनने में मदद करता है। इतिहास पढ़ेंगे तो अपनी यात्रा को बेहतर समझेंगे। संविधान पढ़ेंगे तो अधिकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था को समझेंगे। अर्थशास्त्र पढ़ेंगे तो महँगाई, रोजगार, बचत और आर्थिक नीतियों को समझने में मदद मिलेगी। समाजशास्त्र पढ़ेंगे तो सामाजिक असमानता और परिवर्तन को समझने की दृष्टि मिलेगी। जीवनी पढ़ेंगे तो संघर्ष और नेतृत्व के अलग-अलग अनुभव सामने आएँगे। और साहित्य पढ़ेंगे तो मनुष्य और समाज को समझने की संवेदनशीलता विकसित होगी। इसलिए किताब केवल परीक्षा की तैयारी की वस्तु नहीं है; किताब दृष्टि विकसित करने का माध्यम है।

धानुक जाति के लिए पढ़ने की संस्कृति क्यों जरूरी है?
अगर हम धानुक जाति के सामाजिक विकास, शिक्षा, रोजगार, आर्थिक स्वावलंबन और नेतृत्व की बात करते हैं, तो हमें एक बात स्वीकार करनी होगी—
केवल संख्या से सामाजिक चेतना नहीं आती।
इसके लिए ज्ञान चाहिए।
हमें ऐसे युवा चाहिए जो किसी वायरल संदेश को देखकर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय पूछें—
इसका स्रोत क्या है?
क्या इसका मूल दस्तावेज उपलब्ध है?
क्या दूसरी विश्वसनीय जगहों पर भी यही जानकारी है?
क्या इस विषय का दूसरा पक्ष भी है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
मैंने स्वयं इसके बारे में कितना पढ़ा है?
यही प्रश्न एक जागरूक समाज की पहचान हैं।

सोशल मीडिया छोड़ना समाधान नहीं है
यह भी समझना जरूरी है कि समस्या WhatsApp या Facebook जैसी तकनीक मात्र नहीं है। इन माध्यमों का सही उपयोग किया जाए तो वे ज्ञान, शिक्षा, संवाद और सामाजिक जागरूकता के उपयोगी साधन बन सकते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब हम सोशल मीडिया को ज्ञान का एकमात्र स्रोत बना देते हैं। सोशल मीडिया पर अच्छी किताब की समीक्षा भी मिल सकती है और गलत जानकारी भी। किसी शोध का सार भी मिल सकता है और बिना प्रमाण का दावा भी। इसलिए सोशल मीडिया को दरवाजा बनाइए, पूरा घर नहीं। किसी विषय में रुचि पैदा हो तो आगे बढ़िए और मूल पुस्तक, शोध, सरकारी दस्तावेज या विश्वसनीय स्रोत तक पहुँचिए।

रोज की छोटी आदतें, बड़ा बदलाव
पढ़ने की आदत एक दिन में नहीं बनती। लेकिन रोज के छोटे कदम इसे धीरे-धीरे जीवन का हिस्सा बना सकते हैं।

  1. रोज कम-से-कम 20 मिनट पढ़ें – शुरुआत केवल 20 मिनट से कीजिए। समय कम हो तो 10 मिनट से शुरू करें, लेकिन नियमितता न छोड़ें।
  2. सुबह उठते ही मोबाइल न खोलें – दिन की शुरुआत WhatsApp Forward और Facebook Feed से करने के बजाय कुछ मिनट पढ़ने से करें। सुबह का पहला विचार आपका अपना होना चाहिए, किसी Forward का नहीं।
  3. रोज एक अच्छा लेख पढ़ें – किसी विश्वसनीय समाचार-पत्र, पत्रिका या वेबसाइट से एक अच्छा लेख पढ़िए। पूरा लेख पढ़ने की आदत डालिए, केवल headline नहीं।
  4. महीने में कम-से-कम एक किताब – हर महीने एक पुस्तक चुनिए। जरूरी नहीं कि वह बहुत बड़ी हो। महत्वपूर्ण यह है कि आप उसे पूरा पढ़ें।
  5. एक “Reading Notebook” बनाइए – पढ़ते समय जो बात महत्वपूर्ण लगे, उसे लिखिए। हर दिन केवल तीन बातें लिखें—
    आज मैंने क्या सीखा?
    कौन-सी बात नई लगी?
    मेरे मन में कौन-सा सवाल पैदा हुआ?
    कुछ महीनों बाद यही नोटबुक आपकी अपनी बौद्धिक यात्रा का दस्तावेज बन सकती है।
  6. हर वायरल संदेश पर तीन सवाल पूछिए
    किसी भी महत्वपूर्ण Forward को तुरंत साझा करने से पहले पूछिए—
    स्रोत क्या है?
    प्रमाण क्या है?
    क्या इसकी स्वतंत्र पुष्टि हुई है?
    अगर उत्तर नहीं मिलता, तो उसे आगे भेजने की कोई जल्दी नहीं है।
  7. सप्ताह में एक दिन “Forward-Free Day” रखें
    एक दिन ऐसा रखें जब आप अनावश्यक Forward न भेजें और न ही हर वायरल संदेश पर प्रतिक्रिया दें। उस समय को किताब, अध्ययन या परिवार के साथ सार्थक बातचीत में लगाएँ।
  8. महीने में एक पुस्तक पर चर्चा करें
    दो-चार मित्र मिलकर एक किताब पढ़ सकते हैं। फिर आपस में चर्चा करें—
    लेखक क्या कहना चाहता है?
    क्या हम उससे सहमत हैं?
    कहाँ असहमति है?
    हमने क्या सीखा?
    यही चर्चा धीरे-धीरे एक पढ़ने वाली पीढ़ी तैयार कर सकती है।
  9. बच्चों को किताब उपहार में दें
    जन्मदिन और अन्य अवसरों पर केवल खिलौने या दूसरी वस्तुएँ देने के बजाय बच्चों को अच्छी किताबें भी दें। घर में बच्चों को किताबों के साथ बड़ा होने का अवसर दीजिए।
  10. महीने के अंत में अपना हिसाब कीजिए
    महीने के आखिरी दिन स्वयं से पूछिए—
    इस महीने मैंने कितनी किताबें पढ़ीं?
    कितने अच्छे लेख पढ़े?
    क्या नया सीखा?
    क्या मेरी किसी पुरानी धारणा पर मैंने दोबारा विचार किया?
    यह आत्ममंथन पढ़ने को आदत से आगे ले जाकर जीवन का हिस्सा बना सकता है।

एक किताब से शुरुआत कीजिए
हमें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि पूरा समाज एक साथ बदल जाएगा। परिवर्तन अक्सर एक व्यक्ति से शुरू होता है। फिर एक परिवार से। फिर कुछ मित्रों से। और धीरे-धीरे एक संस्कृति बनती है। इसलिए आज से एक छोटा संकल्प लिया जा सकता है—
हर दिन थोड़ा पढ़ेंगे।
हर महत्वपूर्ण सूचना को परखेंगे।
हर बात पर तुरंत विश्वास नहीं करेंगे।
असहमति को भी पढ़ेंगे।
और अपनी राय बनाने से पहले तथ्य समझने की कोशिश करेंगे। क्योंकि स्वतंत्र सोच केवल अधिकार नहीं, अभ्यास भी है।
और इस अभ्यास का सबसे सरल माध्यम है—
पढ़ना।
धानुक जाति का नवजागरण केवल नारों से नहीं होगा। यह तब मजबूत होगा जब हमारे घरों में किताबें होंगी, हमारे युवाओं के हाथ में अध्ययन सामग्री होगी, हमारे गाँवों में पुस्तकालय होंगे, हमारी बातचीत में तर्क होगा और हमारे निर्णयों में विवेक होगा। WhatsApp और Facebook का इस्तेमाल कीजिए, लेकिन उन्हें अपनी सोच का मालिक मत बनने दीजिए। Forward को पढ़िए, लेकिन सत्यापन के बिना विश्वास मत कीजिए। सोशल मीडिया पर रहिए, लेकिन किताबों से रिश्ता मत तोड़िए। क्योंकि—
जिस समाज की अपनी पढ़ने की आदत मजबूत होती है, उसकी सोच को कोई भी सूचना आसानी से अपने हिसाब से नहीं मोड़ सकती।

आज से शुरुआत करें
आज सिर्फ 20 मिनट पढ़िए। कल फिर 20 मिनट। एक सप्ताह बाद शायद आपको फर्क महसूस हो। एक महीने बाद आपकी सोच में बदलाव दिखने लगेगा। और अगर हजारों लोग यह छोटी-सी शुरुआत करें, तो यह व्यक्तिगत आदत नहीं रहेगी—
यह धानुक जाति में ज्ञान और विवेक की एक नई संस्कृति की शुरुआत हो सकती है।
पढ़िए।
सोचिए।
सवाल कीजिए।
स्रोत खोजिए।
और फिर अपनी राय बनाइए।

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हूल दिवस – क्या भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का पहला अध्याय थी?

हूल दिवसइतिहास केवल राजाओं, सेनाओं और साम्राज्यों का नहीं होता; इतिहास उन लोगों का भी होता है जिनके हाथों में तलवार नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी बचाने का संकल्प होता है। हर वर्ष 30 जून को भारत के पूर्वी राज्यों—विशेषकर झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा—में हूल दिवस मनाया जाता है। यह दिन 30 जून 1855 को शुरू हुए संथाल हूल की स्मृति में समर्पित है, जब सिदो मुर्मू, कान्हू मुर्मू, चाँद मुर्मू और भैरव मुर्मू के नेतृत्व में हजारों संथालों ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन, महाजनी शोषण और जमींदारी व्यवस्था के विरुद्ध खुला विद्रोह किया।

आज जब हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा करते हैं, तो सामान्यतः 1857 के विद्रोह से शुरुआत करते हैं। लेकिन इतिहास का एक प्रश्न बार-बार सामने आता है— यदि 1855 में हजारों आदिवासी अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध हथियार उठा चुके थे, तो संथाल हूल को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का पहला अध्याय या प्रथम स्वतंत्रता संग्राम क्यों नहीं कहा जाता?

हूल का अर्थ क्या है? संथाली भाषा में “हूल” का अर्थ है—विद्रोह, क्रांति या अन्याय के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध। यह केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं थी, बल्कि सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार की घोषणा थी। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन ने राजस्व बढ़ाने के लिए नई भूमि व्यवस्थाएँ लागू कीं। जंगलों और पारंपरिक भूमि पर रहने वाले आदिवासी समुदायों का जीवन पूरी तरह बदल गया। संथाल समाज सदियों से जंगलों पर निर्भर था और आज भी है। जंगल उनके लिए केवल संसाधन नहीं थे; वे उनकी संस्कृति, आस्था, अर्थव्यवस्था और पहचान का आधार थे। लेकिन धीरे-धीरे तीन शक्तियाँ उनके जीवन पर हावी हो गईं—
अंग्रेज़ी प्रशासन
जमींदार
महाजन और साहूकार

अत्यधिक ब्याज, बेगार, भूमि हड़पना, पुलिसिया अत्याचार और प्रशासनिक पक्षपात ने संथाल समाज को अस्तित्व के संकट में धकेल दिया। यह केवल ज़मीन की लड़ाई नहीं थी। अक्सर कहा जाता है कि संथाल हूल केवल भूमि विवाद था। लेकिन यह अधूरा निष्कर्ष है। असल में यह संघर्ष तीन मूल अधिकारों का था—
जल – नदियाँ, तालाब और जलस्रोत जीवन का आधार थे।
जंगल – जंगल भोजन, औषधि, ईंधन, पशुपालन और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र थे।
ज़मीन – ज़मीन केवल संपत्ति नहीं थी; वह पहचान, सम्मान और पीढ़ियों की विरासत थी।
आज जिसे हम पर्यावरण न्याय, आदिवासी अधिकार और सामुदायिक संसाधनों पर अधिकार कहते हैं, उसकी झलक हमें 1855 के हूल में दिखाई देती है।

30 जून 1855 को वर्तमान झारखंड के भोगनाडीह गाँव में हजारों संथाल एकत्र हुए। सिदो और कान्हू ने घोषणा की कि अब अंग्रेज़ी शासन को स्वीकार नहीं किया जाएगा। इतिहासकारों के अनुसार लगभग 30,000 से 60,000 संथाल इस आंदोलन से जुड़े। विभिन्न स्रोतों में यह संख्या अलग-अलग बताई गई है, इसलिए इसे अनुमानित माना जाता है। उन्होंने स्थानीय प्रशासन, महाजनों और औपनिवेशिक तंत्र के विरुद्ध व्यापक प्रतिरोध शुरू किया। ब्रिटिश सरकार ने सैन्य बल का प्रयोग किया और कुछ ही महीनों में हजारों आदिवासी मारे गए।

क्या यह स्वतंत्रता की लड़ाई थी?
यहीं से बहस शुरू होती है। यदि स्वतंत्रता का अर्थ केवल सत्ता परिवर्तन है, तो कुछ इतिहासकार इसे स्थानीय विद्रोह मानते हैं। लेकिन यदि स्वतंत्रता का अर्थ है—
शोषण से मुक्ति,
अपनी भूमि पर अधिकार,
बाहरी शासन का विरोध,
सम्मानपूर्वक जीवन,

तो संथाल हूल निश्चित रूप से स्वतंत्रता का संघर्ष था।

फिर इसे स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा क्यों नहीं माना गया?
इस प्रश्न के कई उत्तर हैं।
1.औपनिवेशिक इतिहास लेखन
ब्रिटिश अधिकारियों ने इस संघर्ष को “Tribal Rebellion”, “Disturbance” या “Insurrection” जैसे शब्दों से दर्ज किया। वे इसे राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन स्वीकार नहीं करना चाहते थे, क्योंकि इससे औपनिवेशिक शासन की वैधता पर प्रश्न उठते।
2.इतिहास किसने लिखा?
भारत के आधुनिक इतिहास का बड़ा भाग अंग्रेज़ी स्रोतों और शिक्षित अभिजात वर्ग के दस्तावेज़ों पर आधारित रहा। आदिवासी समाज की मौखिक परंपराएँ, लोकगीत और स्थानीय इतिहास लंबे समय तक मुख्यधारा के अकादमिक विमर्श में स्थान नहीं पा सके।
3.राष्ट्रवाद की संकीर्ण परिभाषा
लंबे समय तक इतिहास में राष्ट्रवाद का अर्थ शहरी नेतृत्व, राजनीतिक संस्थाओं और अखिल भारतीय संगठनों से जोड़ा गया। जबकि आदिवासी आंदोलनों का उद्देश्य पहले अपने समाज और संसाधनों की रक्षा था।
लेकिन प्रश्न यह है— क्या स्थानीय समाज की स्वतंत्रता की लड़ाई राष्ट्रीय स्वतंत्रता की लड़ाई का हिस्सा नहीं हो सकती?
4.1857 का प्रभाव
1857 का विद्रोह सेना, राजाओं और अनेक क्षेत्रों तक फैला। बाद में इसे “भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” कहा गया। इसके कारण 1855 का संथाल हूल राष्ट्रीय विमर्श में अपेक्षाकृत पीछे चला गया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि 1857 को “प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” कहने की अवधारणा भी बाद के राष्ट्रवादी इतिहासकारों द्वारा लोकप्रिय हुई। उससे पहले ब्रिटिश इतिहासकार इसे “Sepoy Mutiny” (सिपाही विद्रोह) कहते थे। इसलिए दोनों घटनाओं की व्याख्या समय के साथ बदली है।

क्या इतिहास बदलना चाहिए?
इतिहास बदलना नहीं चाहिए, लेकिन इतिहास को पूरा अवश्य किया जाना चाहिए। आज अनेक इतिहासकार यह मानते हैं कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को केवल 1857 से शुरू करके देखना पर्याप्त नहीं है। उससे पहले भी अनेक बड़े जन-आंदोलन हुए—
संन्यासी विद्रोह
चुआड़ विद्रोह
भील विद्रोह
कोल विद्रोह
संथाल हूल

इन आंदोलनों ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध जनप्रतिरोध की परंपरा तैयार की।

भारत के आदिवासी समुदायों ने केवल अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं किया। उन्होंने यह संदेश दिया कि— “जिस समाज की आवाज़ सबसे कम सुनाई देती है, उसका संघर्ष भी राष्ट्र के निर्माण में उतना ही महत्वपूर्ण होता है।” विडंबना यह है कि जिन लोगों ने सबसे पहले अपनी धरती बचाने के लिए जान दी, वे आज भी विकास, शिक्षा और प्रतिनिधित्व की दौड़ में सबसे पीछे हैं।

आज जलवायु परिवर्तन, जंगलों का क्षरण, विस्थापन और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार जैसे प्रश्न फिर से हमारे सामने हैं। हूल हमें याद दिलाता है कि विकास और न्याय साथ-साथ चलने चाहिए। यदि विकास किसी समुदाय की पहचान मिटा दे, तो वह केवल आर्थिक प्रगति नहीं, सामाजिक असंतुलन भी पैदा करता है। हूल दिवस केवल श्रद्धांजलि देने का दिन नहीं होना चाहिए।
यह दिन होना चाहिए—
आदिवासी इतिहास को शिक्षा में उचित स्थान देने का।
स्थानीय नायकों पर शोध को बढ़ावा देने का।
मौखिक इतिहास और लोकसाहित्य का दस्तावेज़ीकरण करने का।
जल, जंगल और ज़मीन के प्रश्नों को संवैधानिक और मानवीय दृष्टि से समझने का।
भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की बहुस्तरीय और समावेशी समझ विकसित करने का।

संथाल हूल केवल 1855 की एक घटना नहीं है। यह भारत के उन करोड़ों लोगों के इतिहास का प्रतिनिधित्व करता है, जिनकी आवाज़ लंबे समय तक इतिहास की पुस्तकों में कम सुनाई दी। यह कहना कि “संथाल हूल ही भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था” इतिहासकारों के बीच सर्वसम्मत निष्कर्ष नहीं है। किंतु यह कहना भी उचित नहीं होगा कि वह केवल एक स्थानीय विद्रोह था। अधिक संतुलित दृष्टिकोण यह है कि संथाल हूल औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारत के सबसे महत्वपूर्ण प्रारम्भिक जन-आंदोलनों में से एक था, जिसने बाद के व्यापक प्रतिरोधों के लिए प्रेरणा और पृष्ठभूमि तैयार की।
शशि धर कुमार

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Dhanuk Samaj and Politicians

मैं हमेशा लिखता रहा हूँ की बिना राजनीती के हम अपने समाज के उत्थान के लिए किसी भी तरह का नीति नहीं बना सकते है और क्यों हमें अपने समाज के राजनेताओं से दूर रहना चाहिए इसके पीछे कई कारण है। हमारी जाती के लोग अपने जाति आधारित नेताओं के साथ उठने में काफी गर्व महसूस करते है। उन्हें लगता है कभी तो उनका भला हो जायेगा लेकिन ऐसा होता नहीं है बहुजन और पिछड़ों के नेताओं में इतनी ताक़त नहीं होती है की वे किसी भी बातो को बहुजनों की हितों की बातें वे खुलकर रख सके ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि उन्हें लगता है उनकी टिकट छीन जाएगी और यही वे सबसे बड़ी गलती कर जाते है। क्योंकि टिकट देने वालों को लगता है जो अपने समाज के लोगो के हितों की बातों को नहीं उठा सकता है वह हमारे लिए किसी भी विरोध में साथ कैसे खड़ा हो सकता है आपके विरोध करने की क्षमता का वहां से पता चलता है। हर बात में हमारे नेताओं की जी-हुजूरी जग जाहिर है वे अपने नेताओं के बारे में सार्वजनिक तौर पर लिखने और बोलने का प्रयास करते रहते है लेकिन उनके नेता इन्हे छोटे से छुटभैया नेता समझ कर जब जरुरत हो मंचासीन कर लेते है जब जरुरत ना हो मंच तो क्या उन्हें दूर दूर भी फटकने नहीं देते है। लेकिन इनकी मोटी बुद्धि में यह बात कभी नहीं आनी है और ना ही आएगी।

इसीलिए मैं अपने सभी युवा साथियों से आग्रह करता हूँ की वे अपना अस्तित्व ढूंढने का प्रयास करे चाहे जहाँ भी मिले वही जाइये लेकिन इज़्ज़त के साथ बोलने और सुनने वाली जगह चुनिए और मुखर होकर बोलिये जब दूसरे नेता अपने जातिहित की बात करते एक बार भी नहीं सोचते है तो आप क्यों सोचे। आप अपने समाज के वोटो को यूं ही नीलाम मत करिये सबसे कहिये अपने विवेकानुसार अपने वोट का प्रयोग करे। क्योंकि आज जिसके लिए वोट के जुगाड़ में आप खड़े है जीतते ही वे कहेंगे आप कौन क्योंकि उनके बच्चे पढ़ रहे है विदेश में और आपके बच्चों को विद्यालय भी नसीब नहीं कभी शिक्षक जनगणना कराने में व्यस्त कर दिए जाते है तो कभी बाढ़ या कोरोना के कारण विद्यालय को कैंप बना दिया जाता है कभी चुनाव में भेज दिया जाता है तो कभी गर्मी छुट्टी फिर कभी ठंढी की छुट्टी या फिर बाढ़ की छुट्टी, आपके बच्चो के भविष्य में पढ़ना नहीं लिखा हो वे ऐसा हर प्रकार से सोचने में लगे रहते है और गलती से हमारे जाति के नेता विधायक बन भी जाए तो उन्हें लगता है वे देश के सर्वोच्च स्थान पर पहुँच गए है फिर उनकी फितरत जाग जाती है पहले वे आपको सुबह शाम आपका हाल चाल जानने को फ़ोन करते थे और अब आप फ़ोन करे तो वे हमेशा व्यस्त नज़र आते है और गलती से उनके दरबार किसी से कहलवा भी भेजा की आपने याद किया है तो वे निर्लज्जता से कहते है आप कौन आपको तो पहचानते ही नहीं है। जब मंच पर खड़े होंगे तो बड़ी बड़ी बातें और लेकिन जाति के नाम पर एक काम इनसे नहीं होता है तब वह प्रोटोकॉल के खिलाफ हो जाता है और तब वे सभी जातियों और सभी धर्मो के राजनेता हो जाते है।

जब इनके पास कुछ नहीं होता है तो यही जाति के निम्न लोग उनके लिए हर संभव मदद कर इन्हें राजनीती में आगे बढाने का काम करते है अपने पॉकेट से अपने बचत के पैसे से इनके लिए प्रचार कर इन्हें आगे बढाने का हर संभव प्रयास करते है लेकिन जीतने के बाद ना तो इनके अन्दर शर्म बची होती है और ना ही हया नाम की कोई ऐसी चीज जिनके पीछे ये छिप पाये। तब ये लोग सिर्फ अपने और अपने चार परिवार के बारे में सोचते है की कैसे आगे की तीन पीढी को सही किया जाय लेकिन इन्हें यह नहीं पता होता है पैसा ऐसा चीज है जो जिस प्रकार कमाया जाता है उसी प्रकार चला जाता है भले आपके जीते जी लोग आपके मूंह पर कुछ ना बोलेन लेकिन आपके मरने के बाद आपकी बातें अवश्य होंगी की आपने विधायक या सांसद बनने से पहले और बाद में क्या और किसके साथ कैसा बर्ताव किया था और यकीन मानिए वही पूंजी है वही आपकी पहचान साबित करेगी और लोग यह भी कहने से नहीं चुकेंगे की आपने अपनी जाति की भावनाओं को सीढी बनाकार अपना और अपने परिवार की भलाई सोची तब आपकी आने वाली पीढी को यह अंदाजा अवश्य लगेगा की आपने अपने जीवन में क्या कमाया है और क्या देकर जा रहे है। पैसा बचाने के लिए भी पढ़ाई आवश्यक है यह हमेशा समझने की जरुरत है अगर आपकी अगली पीढी अपने पैसे के दम पर सोच रही है कुछ भी कर लेंगे खत्म नहीं होने वाला है तो यह दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है।

हमें ऐसे नेताओं को पहचानने की आवश्यकता है और क्यों मैं ऐसे नेताओं से दूर रहने की सलाह देता हूँ:
१) जीतने से पहले आपके साथ हमेशा संपर्क में रहते है और जीतने के बाद आपसे बात भी नहीं करते है और आपसे दुरी बना कर रखते है।
२) जीतने से पहले समाज के साथ उठना बैठना करते है बाद में वे सभी जातियों के एकमात्र सर्वमान्य नेता कहलाने लग जाते है।
३) जीतने से पहले समाज के सम्मेलनों में जाते है लेकिन जीतने के बाद वे नहीं जाते है।
४) जीतने से पहले समाज के हर शिक्षित व्यक्ति को साथ लेकर चलने की बात करते है और जीतने के बाद उन्हें नहीं पता होता है की हमारे समाज के शिक्षित लोग कहाँ कहाँ पर है।
५) जीतने से पहले समाज का आखिरी पायदान पर बैठे व्यक्ति के बीच जाने में कोई समस्या नहीं है लेकिन जीतने के बाद तो रिश्तेदारों तक से दुरी बना लेते है।
६) जीतने से पहले आपके हर व्हात्सप्प सन्देश कर उत्तर देंगे जीतने के बाद वे व्यस्त हो जाते है और उनके पास समय का आभाव हो जाता है।
७) जीतने से पहले हर ठेके पर अपने लोगो के साथ चलते है लेकिन जीतने के बाद अपने लोगो को नहीं देकर दूसरों को देते है क्यों बांकी आप समझदार है।
८) जीतने से पहले उन्हें शिक्षा, बेरोजगारी और समाज में फैले कुव्यवस्था के ऊपर बोलना क्रांतिकारी लगता है लेकिन जीतने के बाद यह अपने नेताओं के खिलाफ जाना लगता है।
९) जीतने से पहले आरक्षण व्यवस्था से जाति की समाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार संभव है लेकिन जीतने के बाद इसपर बोलना उनके पार्टी लाइन के खिलाफ होगा।
१०) जीतने से पहले समाज की हर समस्या उनकी समस्या है लेकिन जीतने के बाद समाज के हर व्यक्ति की समस्या उनकी अपनी नहीं हो सकती है।

आप उपरोक्त सभी बातों पर अपने नेताओं को परखिये फिर बताइए की क्या आपका नेता उपरोक्त बातों पर खड़ा उतरता है या कही ना कही वे भी इसी दस मुख्य बिन्दुओं पर अटक जा रहे है तो आपको सोचने की आवश्यकता है। आज आपका लगता होगा अगली बार इसे नहीं जिताएंगे और अगर उनका अपनी पार्टी से पत्ता साफ़ भी हो गया तो वे दूसरी पार्टी में जाकर अपने लिए टिकट हासिल कर लेंगे क्योंकि सब कुछ पैसे का खेल हो गया है और आपके पास आयेंगे और रोना रोयेंगे की पहली बार जीतने की वजह से उन्हें कुछ भी पता नहीं चला इस बार जिताइये समाज का पूरा भला करेंगे और फिर आप इनके चापलूसी भरी बातों में आकर इनको वोट देकर भेज देंगे और फिर वही होगा जो पहले से होता आया है और यही पिछले ७५ सालों में हुआ है आपके साथ सिर्फ और सिर्फ छलावा और आगे भी होता रहेगा बेह्तर है जितना जल्दी संभलेंगे उतना जल्दी समाज का भला हो पायेगा।
धन्यवाद!
शशि धर कुमार
नोट: सर्वाधिकार सुरक्षित।

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- नॉन बायोलॉजिकल का छोटा भाई

लेख - १६
दिनांक: २९ अक्टूबर २०२६
शीर्षक: "भविष्य के सामाजिक नेतृत्व का निर्माण"
मैं ऐसे लेख की श्रृंखला लेकर आ रहा हूँ जो 'धानुक समाज के नाम आत्ममंथन' के नाम से होगी। पढ़ने के लिए मुझे फॉलो करें। #शशिधरकुमार #धानुकजाति #धानुकसमाज #धानुक #Dhanuk #dhanuksamaj #धानुक_जाति

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