धनुर्धर जाति

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शहीद रामफल मंडल जी का शहादत समारोह

अमर शहीद रामफल मंडल

अमर शहीद रामफल मंडल

अमर शहीद रामफल मंडल जी के शहादत समारोह कार्यक्रम

दिनांक 23 अगस्त 2016 को भारतीय नृत्य केंद्र, नजदीक रेडियो स्टेशन, पटना में अमर शहीद रामफल मंडल जी के शहादत समारोह कार्यक्रम का सफल आयोजन हुआ, जिसमे सभी गणमान्य अथितियों ने अपनी अपनी बात रखी। जो भी इस समाज के प्रतिनिधी आये इस समारोह में और जो नहीं आ पाए उन सभी का हार्दिक अभिनंदन। आशा करते है आप सभी का पटना आना एक सफल शुरुआत होगी धानुक समाज को एकत्र करने में और आपके इस सहयोग को महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में आने वाले कल में याद किया जाएगा।

 

समारोह में कई गणमान्य व्यक्तियों ने अपनी अपनी बात रखी जिनसे यह तो पता चलता है कि अभी तक इस समाज का हर प्रकार से दोहन हुआ है चाहे राजनैतिक हो या सामाजिक दोहन लेकिन हुआ है और इसका मुख्य कारण यह निकलकर सामने आया की इसकी मुख्य वजह सिर्फ और सिर्फ हमारा सामाजिक एकता नही होना। तो सभी की तरफ से इस बात पर जोड़ दिया गया कि हमें एक सूत्र और हमारी एकता हमारे समाज के लिए जरुरी है। कुछ प्रतिनिधियों ने शिक्षा पर जोड़ देकर कहा कि हमारे समाज की शैक्षणिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण हमारी यह हालत है तो हमें शिक्षा की ओर ध्यान देकर इस समाज के लोगो को शैक्षणिक स्तर पर उठाने की कोशिश करनी चाहिए। कुछ प्रतिनिधियों ने इस बात पर भी बल दिया की हमारी यह लड़ाई राजनैतिक स्तर पर भी जारी रहनी चाहिए ताकि हमारे इस मुहीम को और मजबूती मिल सके।

 

अंत में बिहार प्रदेश के अध्यक्ष् श्री शैलन्द्र मंडल जी ने युवाओं को अधिक अधिक से इस मुहीम से जोड़कर ही हम इस मुहीम को सफल बना सकते है क्योंकि धानुक समाज की लगभग आधी जनसंख्या युवाओं की है और यही युवा हमें हमार समाज में फैलीे कुरीतियों से हमें निजात दिला सकते है। जरुरत है उनकी कार्यक्षमता को पहचानने की और उनपर विश्वास जगाने की ताकि यही युवा आगे चलकर इस समाज के कर्णधार बनकर उभरे। उन्होंने धानुको की लड़ाई को अस्तित्व की लड़ाई कहा जहाँ हमारी जाती को सरकारी तौर पर वह स्थान नहीं मिला जिसकी वह हक़दार है।

 

मौके पर सहकारिता मंत्री आलोक मेहता,शैलेंद्र कुमार मंडल,नारायण सिंह केसरी,डॉ.दाउद अली,रामश्रेष्ठ दीवाना,डॉ.नूर हसन, शीला शैल, रामप्रीत मंडल, बलराम मंडल आदि ने भी विचार रखे। मौके पर रामफल मंडल की गाथा पुस्तक का विमोचन किया गया उनके नाम पर पुरस्कार की घोषणा की गई।

 

कार्यक्रम से सम्बंधित कुछ तस्वीरें जो विभिन्न स्रोतों से हासिल की गयी:

फ़ोटो क्रेडिट: अजय देव, डॉ भवेश, अमरजीत, इनरदेव आदि।

 

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शहीद रामफल मंडल जी का जीवन परिचय

अमर शहीद रामफल मंडल जी की जीवन का संक्षिप्त परिचय:

अमर शहीद रामफल मंडल

अमर शहीद रामफल मंडल

पिता – गोखुल मंडल
माता – गरबी मंडल
पत्नी – जगपतिया देवी
जन्म – 6 अगस्त 1924
ग्राम+पोस्ट – मधुरापुर
थाना – बाजपट्टी
जिला – सीतामढ़ी
राज्य – बिहार
आरोप – 24 अगस्त 1942 को बाज़पट्टी चौक पर अंग्रेज सरकार के तत्कालीन सीतामढ़ी अनुमंडल अधिकारी हरदीप नारायण सिंह, पुलिस इंस्पेक्टर राममूर्ति झा, हवलदार श्यामलाल सिंह और चपरासी दरबेशी सिंह को गड़ासा से काटकर हत्या।
कैद – भागलपुर केंद्रीय कारागार
कांड संख्या – 473/42
केस की सुनवाई – माननीय सी आर सैनी न्यायलय भागलपुर
फाँसी की तिथि – दिनांक 23 अगस्त 1943, केंद्रीय कारागार भागलपुर
शादी – 16 वर्ष की उम्र में
शहीद – 19 बर्ष की उम्र में
जेल जीवन – 11 महीना
दिनांक 1 सितंबर 1942 को रामफल मंडल जी की गिरफ्तारी जेल सीतामढ़ी
दिनांक 5 सितंबर 1942 को भागलपुर केंद्रीय कारागार
दिनांक 15 जुलाई को कांग्रेस कमिटी बिहार प्रदेश में रामफल मंडल एवं अन्य के सम्बन्ध में SDO, इंस्पेक्टर एवं अन्य पुलिस कर्मियों की हत्या के आरोपो पर चर्चा।

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वर्तमान बिहार के प्रथम बिहारी शहीद

अमर शहीद रामफल मंडल

अमर शहीद रामफल मंडल

अमर शहीद रामफल मंडल

अमर शहीद रामफल मंडल, आजादी के आन्दोलन में बिहार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, फिर भी वर्तमान बिहार एवं बिहारियों की कुर्वानी को आकलन करने से यह महसूस होता है कि कहीं न कहीं उन बिहारियों की उपेक्षा की गयी है, जिन्होंने अपनी कुर्बानी फांसी को गले लगाकर आजाद भारत के निर्माण में अपना योगदान दिया था। वैसे तो सम्पूर्ण भारत के निवासियों ने अपने-अपने स्तर पर देश की आज़ादी में अपनी अपनी भूमिका निभायी, जिसमें उस समय के तत्कालीन बिहार की भूमिका अग्रणी रही है। उस समय के बिहार का चाहे “देवघर विद्रोह”(1857), “दानापुर विद्रोह”(1857) , “विरसा मुंडा आन्दोलन, खूंटी”(1900), “चंपारण सत्याग्रह” (1918 -19), “अंग्रेजो भारत छोड़ो” एवं “करेंगे या मरेंगे” (1942) आन्दोलन हो, सभी में बिहार ने अग्रणी भूमिका अदा की है। लाठियां और गोलियां खायी है और फांसी को गले लगाया है। गोली से मारे गये शहीदों की संख्या हजारों में है, जबकि फांसी पर लटकाए गए शहीदों की संख्या सैकड़ों में। गोली खाकर शहीद होना घटना/दुर्घटना हो सकती है परन्तु फांसी पर लटकाया जाना वैचारिक शहीद। यही वजह है कि अमर शहीद भगत सिंह, राज गुरु ,सुखदेव, चन्द्रशेखर आज़ाद आदि का नाम बच्चा- बच्चा जानता है। परन्तु बिहारी शहीदों को जो सम्मान मिलना चाहिए था, वह उचित सम्मान आज तक नहीं मिल पाया है।

उदाहरण स्वरुप अमर शहीद रामफल मंडल जी को ही लिया जाये। आप अवगत है कि अमर शहीद रामफल मंडल जी ने बाजपट्टी, सीतामढ़ी में 1942 में अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभायी। आन्दोलन को दबाने के लिए अंग्रेजो द्वारा सीतामढ़ी गोलीकांड हुई बच्चे, बूढ़े और औरत गोलीकांड में मारे गए, विरोध स्वरुप वीर सपूत रामफल मंडल ने गोलीकांड के जबाबदेह अंग्रेजी हुक्मरानों के तत्कालीन एस.डी.ओ. एवं अन्य दो सिपाही को गडासा से कुट्टी-कुट्टी काट दिया था और आजाद भारत/बिहार के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभायी थी।

वर्तमान बिहार के सन्दर्भ में फांसी पर लटकाए गए शहीदों को खंगालना शुरू किया तो एक तथ्य सामने आयी है कि अमर शहीद रामफल मंडल वर्तमान बिहार के 1942 क्रांति के प्रथम बिहारी सपूत है जिन्हें फांसी पर लटकाया गया। कैसे?

12 जून 1857 ई. को पहले-पहल रोहणी (देवघर, जो आज झारखण्ड में है।) में देशी सैनिक विद्रोह हुआ , जिसमें तीन देशी सैनिकों को फांसी दी गयी। (1857 में बिहार, जो उस समय बंगाल प्रोविंस में था, तब के बंगाल प्रोविंस में आज का बंगलादेश ,असम, पश्चिम बंगाल ,उड़ीसा और बिहार शामिल था। आज यह झारखण्ड में है।)

पटना में पेशे से जिल्दसाज पीर अली क्रांतिकारियों को अंग्रेजों की गतिविधियों का गुप्त संदेश देते थे। पटना के तत्कालीन कमिश्नर विलियम टेलर ने खान और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया। अंग्रेजी हुकूमत ने 7 जुलाई, 1857 को पीर अली के साथ घासिता, खलीफा, गुलाम अब्बास, नंदू लाल उर्फ सिपाही, जुम्मन, मदुवा, काजिल खान, रमजानी, पीर बख्श, वाहिद अली, गुलाम अली, महमूद अकबर और असरार अली को बीच सड़क पर फांसी पर लटका दिया था। राजधानी पटना के गांधी मैदान के निकट शहीद पीर अली चिल्ड्रेन पार्क उन्ही के नाम पर है। अमर शहीद पीर अली साहब का जन्म संभवतः उत्तरप्रदेश ,आजमगढ़ हुआ था।

7 जनवरी 1900 को तीन सौ मुंडाओ ने तीर-धनुष, भाले से लैस होकर खूटी थाना (आज का झारखण्ड) पर हमला कर एक सिपाही को को मार दिया ,बिरसा मुंडा को पकड़ लिया गया ,लगभग 350 लोंगों पर मुक़दमा चला, तीन को फांसी दी गयी।

खुदीराम बोस को मौजूदा राज्य बिहार के मुजफ्फरपुर शहर में किए गए एक बम हमले का दोषी पाया गया और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई, मिदनापुर (पश्चिम बंगाल) में 1889 में पैदा हुए बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों में शामिल थे। भारतीय आजादी की लड़ाई के सबसे युवा शहीदों में एक खुदीराम बोस को 1908 में फांसी दे दी गई। खुदीराम को जब फांसी पर चढ़ाया गया, तो उनकी उम्र सिर्फ साढ़े 18 साल थी। 11 अगस्त, 1908 को फांसी वाले दिन पूरे कोलकाता में लोगों का हुजूम लग गया। उस वक्त अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे भारतीय युवाओं को फांसी देना कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी, लेकिन इस उम्र के एक क्रांतिकारी के सामने आने पर बोस को काफी सहानुभूति मिली।

अमर शहीद जुब्बा सहनी को मुजफ्फरपुर थाना को घेरकर आग लगाने एवं सिपाहियों को आग में फेकने के आरोप में 11 मार्च 1944 को फांसी दी गयी।

इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि 1942 क्रांति के बाद अमर शहीद रामफल मंडल वर्तमान बिहार के पहले शहीद हैं जिन्हें फांसी दी गयी।

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कुछ वर्षों से हमारे उत्तर-भारतीय हिंदी समाज में एक 'धर्मात्मा', 'धर्म-प्रचारक' या 'धर्मगुरू' ये भी 'अवतरित' हुआ है! सोचिये, ऐसे तत्व समाज, धर्म और देश को कहां ले जाकर छोड़ेंगे!

“राम जी के पांच बाप थे”

- नॉन बायोलॉजिकल का छोटा भाई

लेख - १६
दिनांक: २९ अक्टूबर २०२६
शीर्षक: "भविष्य के सामाजिक नेतृत्व का निर्माण"
मैं ऐसे लेख की श्रृंखला लेकर आ रहा हूँ जो 'धानुक समाज के नाम आत्ममंथन' के नाम से होगी। पढ़ने के लिए मुझे फॉलो करें। #शशिधरकुमार #धानुकजाति #धानुकसमाज #धानुक #Dhanuk #dhanuksamaj #धानुक_जाति

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