आज धानुक जाति के नाम से अनेक WhatsApp और Facebook समूह दिखाई देते हैं। कहीं संगठन की चर्चा है, कहीं सामाजिक गतिविधियों की, कहीं राजनीति की। यह अच्छी बात है कि लोग जुड़ रहे हैं। लेकिन एक सवाल बार-बार मन में आता है—क्या हम वास्तव में जुड़ रहे हैं, या केवल एक-दूसरे को संदेश भेज रहे हैं?
किसी समूह की असली उपयोगिता उसके सदस्यों की संख्या से नहीं, बल्कि उसमें होने वाली सार्थक बातचीत से तय होती है। जब शिक्षा की बात होती है—कितने बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, गांवों में पुस्तकालय कैसे बनें, आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों की मदद कैसे हो—तो चर्चा कुछ ही संदेशों के बाद शांत हो जाती है। रोजगार की बात करें तो सवाल उठता है कि हमारे युवाओं को नौकरी के अलावा कौशल, व्यवसाय और उद्यमिता की दिशा में कैसे आगे बढ़ाया जाए। लेकिन ऐसे विषयों पर लगातार संवाद बनाए रखना कठिन दिखाई देता है। महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक भागीदारी, नशामुक्ति, दहेज, स्वास्थ्य, सामाजिक कुरीतियां, आर्थिक सहयोग और आने वाली पीढ़ी के नेतृत्व जैसे विषय तो अक्सर राजनीतिक बहस के मुकाबले बहुत पीछे छूट जाते हैं।
इसके विपरीत राजनीति का विषय आते ही समूह अचानक सक्रिय हो जाता है। संदेशों की बाढ़ आ जाती है। पक्ष-विपक्ष में लंबी बहस शुरू हो जाती है। कई बार व्यक्तिगत टिप्पणियां भी होने लगती हैं। राजनीति पर चर्चा होना गलत नहीं है। लोकतंत्र में राजनीतिक जागरूकता आवश्यक है। लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीति हमारी सारी सामाजिक चर्चा पर इतनी हावी हो जाए कि समाज के मूल प्रश्न ही पीछे चले जाएं?
एक समाज की प्रगति केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि उसके कितने लोग राजनीति में सक्रिय हैं। यह भी देखना होगा कि उसके कितने बच्चे अच्छी शिक्षा पा रहे हैं, कितने युवा रोजगार और कौशल की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, कितने परिवार आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं और कितनी महिलाएं निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग ले रही हैं। हमें अपने समूहों से यह सवाल पूछना चाहिए—
हम यहां केवल प्रतिक्रिया देने के लिए हैं या समाधान खोजने के लिए?
यदि किसी समूह में चुनाव पर दो घंटे बहस हो सकती है, तो किसी विद्यार्थी की पढ़ाई पर बीस मिनट क्यों नहीं?
यदि किसी राजनीतिक बयान पर दर्जनों लोग अपनी राय दे सकते हैं, तो रोजगार या व्यवसाय शुरू करने के अवसर पर कुछ लोग मिलकर जानकारी क्यों नहीं जुटा सकते?
यदि हम संगठन बना सकते हैं, तो क्या हम कोई साझा अध्ययन केंद्र नहीं बना सकते?
यदि हम हजारों संदेशों को आगे भेज सकते हैं, तो क्या हम महीने में एक अच्छी पुस्तक पढ़कर उस पर चर्चा नहीं कर सकते?
शायद अब समय आ गया है कि हम अपने समूहों की संख्या नहीं, उनकी दिशा पर विचार करें। राजनीति हमारे जीवन का एक हिस्सा हो सकती है, लेकिन धानुक जाति का पूरा भविष्य राजनीति नहीं है।
भविष्य शिक्षा में है।
भविष्य कौशल में है।
भविष्य आर्थिक स्वावलंबन में है।
भविष्य महिलाओं और युवाओं की भागीदारी में है।
भविष्य वैज्ञानिक सोच और सामाजिक चेतना में है।
इसलिए अगली बार जब किसी समूह में बहस शुरू हो, तो एक सवाल जरूर पूछिए—
“इस चर्चा से हमारी अगली पीढ़ी को क्या मिलेगा?”
क्योंकि समूह बनाना आसान है। लेकिन ऐसा संवाद बनाना, जिससे समाज आगे बढ़े—वही असली संगठन है।




