किसी भी जाति या समाज का भविष्य उसके युवाओं से जुड़ा होता है। युवा केवल संख्या नहीं होते—वे आने वाले समय के शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी, उद्यमी, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और नेतृत्वकर्ता होते हैं। फिर सवाल उठता है—
क्या हम अपने युवाओं के भविष्य पर उतनी गंभीरता से चर्चा करते हैं, जितनी राजनीति पर करते हैं?
धानुक जाति के अनेक सामाजिक और डिजिटल समूहों में युवा बड़ी संख्या में जुड़े हैं। लेकिन उन्हें लेकर हमारी चर्चा अक्सर सीमित रह जाती है।
किस नेता ने क्या कहा?
किस चुनाव में क्या हुआ?
किस संगठन में कौन पद पर है?
इन सवालों के बीच एक बड़ा सवाल पीछे छूट जाता है—
हमारे युवा कल के लिए क्या सीख रहे हैं?
आज केवल डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं है। बदलती अर्थव्यवस्था में तकनीकी ज्ञान, डिजिटल कौशल, संचार क्षमता, अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं में प्रभावी अभिव्यक्ति, वित्तीय समझ, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और उद्यमिता जैसे कौशल भी महत्वपूर्ण हैं। हर युवा सरकारी नौकरी नहीं पा सकता और न ही हर युवा को केवल सरकारी नौकरी को सफलता का एकमात्र रास्ता मानना चाहिए। किसी के लिए प्रतियोगी परीक्षा सही रास्ता हो सकता है। किसी के लिए निजी क्षेत्र। किसी के लिए तकनीकी कौशल। किसी के लिए व्यवसाय। किसी के लिए खेती को आधुनिक तरीके से आगे बढ़ाना। किसी के लिए डिजिटल काम या स्वतंत्र पेशा।
जरूरत है विकल्पों की जानकारी और सही मार्गदर्शन की। यही वह जगह है जहां धानुक जाति के संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कल्पना कीजिए कि
प्रत्येक जिले में कुछ ऐसे युवा हों जो प्रतियोगी परीक्षाओं की जानकारी साझा करें।
कोई रोजगार के अवसरों की विश्वसनीय जानकारी जुटाए।
कोई कौशल प्रशिक्षण की जानकारी दे। कोई सफल विद्यार्थियों और पेशेवरों से मार्गदर्शन सत्र आयोजित करे।
छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।
इसके लिए हमेशा बड़ी राशि की आवश्यकता भी नहीं होती।
एक कमरा, कुछ किताबें, इंटरनेट और कुछ समर्पित लोग—कई बार इतना ही एक अध्ययन केंद्र की शुरुआत के लिए पर्याप्त हो सकता है। हमें यह भी समझना होगा कि युवा केवल सहायता पाने वाले लोग नहीं हैं। वे स्वयं परिवर्तन के भागीदार हो सकते हैं।
आज जो युवा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है, वह कल दूसरे विद्यार्थियों का मार्गदर्शन कर सकता है। जो युवा व्यवसाय कर रहा है, वह दूसरे युवाओं को रोजगार और उद्यमिता की जानकारी दे सकता है। जो युवा किसी क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल कर चुका है, वह अपने अनुभव को समाज की अगली पीढ़ी तक पहुंचा सकता है। इसलिए आवश्यकता केवल “युवाओं के लिए कार्यक्रम” बनाने की नहीं है। आवश्यकता है युवाओं को नेतृत्व की जिम्मेदारी देने की। संगठनों को यह भी सोचना चाहिए कि उनकी बैठकों में कितने युवा निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल हैं।
क्या उन्हें केवल भीड़ के रूप में बुलाया जाता है?
या उनकी राय भी सुनी जाती है?
क्या उन्हें केवल सोशल मीडिया पोस्ट बनाने की जिम्मेदारी मिलती है?
या संगठन की वास्तविक योजनाएं बनाने का अवसर भी मिलता है?
अगर हम चाहते हैं कि धानुक जाति की अगली पीढ़ी मजबूत बने, तो आज से ही उसे ज्ञान, कौशल, अवसर और नेतृत्व का वातावरण देना होगा। राजनीतिक बहस कल भी होती रहेगी। लेकिन युवा का एक वर्ष वापस नहीं आता। इसलिए आज का सबसे जरूरी सवाल शायद यह नहीं है कि हमारे युवा किसके साथ हैं।
सवाल यह है— हमारे युवा अपने भविष्य के लिए कितने तैयार हैं?
और उससे भी बड़ा सवाल— हम उनके भविष्य को बेहतर बनाने के लिए आज क्या कर रहे हैं?






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