अमर शहीद रामफल मंडल
अमर शहीद रामफल मंडल, आजादी के आन्दोलन में बिहार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। अपने पूर्वजो के इतिहास और बलिदान को भूलने वाला समाज और देश हमेश और गुलाम होता है। बंगाल विभाजन के बाद अखंड बिहार का पहला शहीद जिसको अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी पर चढ़ाया था। इन्होने आजादी के लिए अंग्रेजी फ़ौज से लोहा लेकर बाजपट्टी में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ धावा बोलकर एक अंग्रेज एसडीओ समेत चार पुलिसकर्मी की हत्या के जुर्म में सीतामढ़ी से गिरफ्तार कर भागलपुर केंद्रीय जेल भेजा गया था। यह सीतामढ़ी के लिए नहीं अपितु पुरे बिहार के लिए गौरव की बात है लेकिन उन्हें जो सम्मान मिलना चाहिए उन्हें नहीं मिला। उनके शहादत को जन जन तक पहुंचाने के लिए हम सबको उनके बलिदान के बारे सभी बिहार वासियों को बताना होगा।
उनकी भूमिका इसीलिए महतवपूर्ण हो जाती है क्योंकि उस समय गाँधी जी ने अंग्रेजो भारत छोड़ो का आहवान ही किया था और वे इस यज्ञ में कूद पड़े बिना यह जाने की उनके पीछे उनके परिवार का क्या होगा। अमर शहीद रामफल मंडल, ६ अगस्त १९२४ को बाजपट्टी प्रखंड के मधुरापुर निवासी गोखुल मंडल और गरबी देवी के घर तीसरे पुत्र के रूप मे जन्मे देश की स्थिति को लेकर काफी संवेदनशील थे और जैसे ही १९४२ का आन्दोलन की आग पुरे देश में भड़की वैसे ही अमर शहीद रामफल मंडल जी इस आन्दोलन में कूद पड़े। उसी समय बाजपट्टी में आजाद हिंद फ़ौज का सैन्य प्रशिक्षण शिविर चलता था और यहाँ के लोगो को अंग्रेजो से लोहा लेने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता था। दफादार शिवधारी कुंवर ने छल से उन्हें गिरफ्तार करवा दिया तब उन्हें गिरफ्तार कर डुमरा जेल में बंद किया गया और बाद में भागलपुर केंद्रीय जेल स्थान्तरित कर दिया गया जहाँ उन्हें १५ अगस्त १९४३ को उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी और २३ अगस्त १९४३ की सुबह भागलपुर केंद्रीय जेल में १९ वर्ष और १७ दिन की आयु में उन्हें फांसी दे गयी। विडंबना देखिये जिस तारीख को उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी उसी तारीख को ५ साल बाद अंग्रेजो को भारत छोड़कर जाना पड़ा।







