धनुर्धर जाति

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धानुक जाति

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धानुक भारत, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में पाए जाने वाले एक समुदाय के लोग हैं। भारत में, धानुक बिहार, झारखंड, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, पंजाब, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और अन्य राज्यों में पाए जाते हैं। नेपाल में, वे तराई के जिलों – सप्तरी, सिराहा और धनुषा – में बसे हुए हैं। वे मूल निवासी जनजाति के लोग हैं। पूर्वी तराई के धानुक ‘मंडल’ के नाम से भी जाने जाते हैं, लेकिन यह उपनाम बिहार के ज़्यादातर धानुक इस्तेमाल करते हैं। ‘जसवार कुर्मी’ भी धानुक समुदाय का ही एक हिस्सा हैं। धानुक हिंदू होते हैं और हिंदी की कई बोलियाँ बोलते हैं।

उनका जीवन कैसा होता है?

अन्य जनजातियों की तरह ही, जन्म, मृत्यु और विवाह से जुड़े रीति-रिवाजों को यहाँ भी पूरा महत्व दिया जाता है। गर्भवती महिला को एक अलग घर में रखा जाता है ताकि दाई (midwife) से मदद मिल सके। बच्चे के जन्म लेते ही उसे रुलाया जाता है। घर के मुख्य द्वार पर बेर की टहनियाँ और फेंके हुए जूते रखकर बुरी आत्माओं को दूर भगाया जाता है। बच्चे को बकरी का दूध पिलाया जाता है। छठे दिन ‘छैटी’ और बारहवें दिन ‘बारही’ का संस्कार किया जाता है। ‘बारही’ के मौके पर पूजा-पाठ और उत्सव का आयोजन होता है।

धानुक अपने ही गोत्र में शादी नहीं करते हैं और न ही उनमें ममेरे-फुफेरे भाई-बहन के बीच शादी की प्रथा है। ज़्यादातर मामलों में, माता-पिता ही लड़के या लड़की की तलाश करते हैं। पड़ोसियों के प्रभाव के कारण उनमें दहेज प्रथा भी प्रचलित है।

जब किसी धानुक की मृत्यु होती है, तो 12 साल से ज़्यादा उम्र के व्यक्ति के शव का अंतिम संस्कार (दाह-संस्कार) किया जाता है, जबकि 12 साल से कम उम्र के व्यक्ति के शव को दफनाया जाता है।

धानुक लोगों के घरों की पुताई मिट्टी से की जाती है और मिट्टी से ही उन पर चित्र भी बनाए जाते हैं। महिलाएँ काम के लिए बाहर जाती हैं, लेकिन परिवार का मुखिया पुरुष ही होता है। अलग-अलग मौकों पर कई दावतों का आयोजन किया जाता है। कुछ धानुक शराब या स्थानीय मदिरा का सेवन बिल्कुल नहीं करते हैं।

धानुक लोगों के घर नदियों की घाटियों और जंगलों के किनारे समूहों में बने होते हैं। वे नदियों की घाटियों में बसना पसंद करते हैं। दस या ग्यारह घरों का एक समूह मिलकर एक समिति बनाता है और पाँच समितियाँ मिलकर एक ‘परगना’ बनाती हैं। परगना के मुखिया को ‘मरार’ कहा जाता है। उनके ऊपर ‘चौरासी’ नाम का एक पद होता है, लेकिन आजकल ये सभी व्यवस्थाएँ पारंपरिक नियमों के अनुसार चलती हैं। ये संस्थाएँ आदिवासी समाज में आपसी मेल-मिलाप और झगड़ों को सुलझाने का काम करती हैं। जो लोग नियमों का पालन नहीं करते, उन्हें समुदाय से निकाल दिया जाता है।

चूंकि ये लोग नदी-घाटियों और जंगलों के किनारे रहते हैं, इसलिए ये खेती, मछली पकड़ने और पशुपालन का काम करते हैं। धानुक समुदाय के कुछ लोग बड़े ज़मींदार भी हैं, लेकिन जो धानुक अल्पसंख्यक समूह से आते हैं, उनके पास बिल्कुल भी ज़मीन नहीं है। वे खेतिहर मज़दूर और घरों में नौकर के तौर पर काम करके अपनी आजीविका चलाते हैं।

उनकी मान्यताएँ क्या हैं?

कुछ जगहों पर ब्राह्मणों को पुजारी के तौर पर नियुक्त किया जाता है, जबकि दूसरी जगहों पर वे धानुक पुजारियों की सेवा लेते हैं। धानुक जाति जादू-टोने और भूत-प्रेतों में विश्वास करती है। वे दो धार्मिक समूहों में बँटे हुए हैं: एक समूह काली की पूजा करता है और उन्हें अपनी कुलदेवी मानता है, जबकि दूसरा समूह शीतला माता की पूजा करता है। काली की पूजा करने वाले मांस खाते हैं और शराब पीते हैं, जबकि शीतला माता के भक्त ऐसा नहीं करते। वे शीतला माता नाम की देवी की पूजा करते हैं। धानुक लोगों का मुख्य काम खेती-बाड़ी से जुड़ा है और यह बात भारत के सभी राज्यों में लागू होती है।

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कुछ वर्षों से हमारे उत्तर-भारतीय हिंदी समाज में एक 'धर्मात्मा', 'धर्म-प्रचारक' या 'धर्मगुरू' ये भी 'अवतरित' हुआ है! सोचिये, ऐसे तत्व समाज, धर्म और देश को कहां ले जाकर छोड़ेंगे!

“राम जी के पांच बाप थे”

- नॉन बायोलॉजिकल का छोटा भाई

लेख - १६
दिनांक: २९ अक्टूबर २०२६
शीर्षक: "भविष्य के सामाजिक नेतृत्व का निर्माण"
मैं ऐसे लेख की श्रृंखला लेकर आ रहा हूँ जो 'धानुक समाज के नाम आत्ममंथन' के नाम से होगी। पढ़ने के लिए मुझे फॉलो करें। #शशिधरकुमार #धानुकजाति #धानुकसमाज #धानुक #Dhanuk #dhanuksamaj #धानुक_जाति

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